झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४२१ मोरोपन्त ताम्बे ने बहुत सा द्रव्य और जवाहर इकट्ठे किये। किले के उत्तरी भाग में नीचे की ओर द्वार की बगल में एक हवेली, हाथीखाना और घुडसार थी। लडाई के दिनो में जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह इसी हवेली में रहते थे। मोरोपन्त ने एक हाथी पर जवाहर और अशर्फियां लादी। और लोगो ने कमर में अशर्फिया बाधी। रानी और मुन्दर पुरुष वेश में घोडो पर सवार हुईं। उस समय रात बहुत नही गई थी। पूर्व दिशा में बडा तारा ऊपर चढ आया था। घना अँधेरा केवल शहर की आगो से फट फट जा रहा था। अँधेरे के ऊपर बड़े छोटे तारे दम दमा रहे थे। नीचे शहर के अँधेरे पर उन आगो के बड़े बड़े लाल-पीले छपके से पड पड जाते थे। रानी ने एक चादर से दामोदरराव को पीठ पर कसा और अपने तेसस्वी सफेद घोडे को किले के उत्तरी भाग से निकालकर आगे किया। पीछे पीछे पठान, मुन्दर, जवाहरसिंह, रघुनाथसिंह इत्यादि। द्वार से निकलते ही उन्होने किले को नमस्कार किया, झासी को नमस्कार किया। कण्ठ में कुछ अवरोधसा अवगत किया। इस भय से कि कही आख में आसू न आ जाय उन्होने उत्तर दिशा की ओर मुह मोडा और किले के उतार के नीचे आ गईं। किला बिलकुल सूना छोडा। मोरोपन्त का हाथी बीच में था। सवार अधिक न थे। उनकी रक्षा के हेतु बाकी सैनिक पैदल थे। नङ्गी तलवारे लिये हुये। यह टोली टकसाल के पश्चिम वाले मार्ग से भाडेरी फाटक की ओर अग्रसर हुई। जैसे ही कोतवाली की बराबरी पर आई अङ्गरेज़ी सेना से भिडामिडी हो गई। रानी 'हर हर महादेव' उच्चार करती हुई उनको चीरती फाडती मुन्दर सहित निकल गईं। पठान शत्रुओ से बेतरह लडे। बहुत से मारे गये बाकी आगे बढे। जगह जगह-जलते हुये मकानो से उजाला हो रहा था। रानी और अनेक सङ्गी द्रुत गति से भाडेरी फाटक के निकट पहुच गये। वहां बख्शी कोरियो को लिये हुये अङ्गरेज़ी फौज की एक टुकडी को तलवार के युद्ध