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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 431

४२७ झांसी की रानी

भाऊ बख्शी ने जिम्मा लिया । उसका मकान कोरियो के मुहल्ले के निकट था । और वह उन लोगो को अच्छी तरह जानता था । * बख्शी गुप्त मार्ग से किले के बाहर चला गया । रानी ने अपने पुराने सेवक सेविकाओ को पुरस्कार देकर विदा किया । वे पैर छू छूकर, रो रोकर वहा से चले गये । नाना भोपटकर भी चला गया । जवाहरसिंह को रानी ने आज्ञा दी, 'आप अपने इलाके में जाकर सैन्य संग्रह करिये और कालपी आ जाइये ।' जवाहरसिंह ने प्रार्थना की, 'मे आपको सुरक्षित स्थान में पहुँचाकर लौटूँगा अन्यथा नही । केवल इस आज्ञा का जीवन में उल्लङ्घन किया है । इस अपराध के लिये क्षमा चाहता हूं ।' रानी ने स्वीकार किया । थोडे समय उपरान्त रानी और मुन्दर महादेव के मन्दिर में गईं । वन्दना की । ध्यान किया । समाप्ति पर रानी ने मुन्दर से कहा, वह पलाश अब भी फूल रहा है । सिन्दूरोत्सव के दिन की मालाये अब भी उससे लिपटी होगी ।' मुन्दर बोली, 'एक बार उसको भेट लीजिये बाईसाहब ।' 'अवश्य,' रानी ने कहा, 'वह हर साल फूलेगा और झासी हरसाल 'सिन्दूरोत्सव मनायेगी । झासी का सिन्दूर अमर हो ।' उन दोनो ने उस पलाश से भेंट की । मुन्दर बोली, 'फूल की मालायें सूख गई हैं ।' रानी ने कहा, 'उनकी आत्मा तो हरी-भरी है । ये उनके चढ़ाये फूल हैं जो इस युद्ध में वलिदान हो गईं हैं ।' इसके बाद वे दोनो महल पर आ गईं ।


  • बख्शी की हवेली के नाम से वह मकान अब भी प्रसिद्ध है । श्री सेठ जिनदास कोचर के अधिकार मे है । अमेरिकन मिशन की कुछ स्त्रिया उसमें किराये से रहती थी ।
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