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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ४१६ आप किले के बाहर होइये अग्रेजो की सेना को चीरते हुये निकल जाइये और कालपी पहुँच कर पुनश्च हरिओ३म् कीजिये।' रानी सोचने लगी। भोपटकर ने मुन्दर को दामोदरराव के लिवा लाने के लिये इशारा किया। वह उसके लेने के लिये चली गई। रानी की आखो के सामने एक दृश्य घूम गया'--- 'कुरुक्षेत्र का मैदान है। कौरव पाण्डवो की सेनाये एक दूसरे के सामने डटी हुई हैं। अर्जुन ने कृष्ण से कहा, भगवन् मेरा साहस डिग गया है। मेरा सामर्थ्य हिल गया है। मै असमर्थ हूँ लडना नही चाहता। भगवान कृष्ण ने उद्बोधन किया। अर्जुन ने फिर गाण्डीव धनुष हाथ में ले लिया।' आखो के भीतर ही रानी को एक चमत्कार की अभिव्यक्ति हुई। इतने में दामोदरराव वहा आ गया। दौड़कर रानी की गोद में बैठ गया। गुलमुहम्मद ने कहा, 'सरकार अमारा सारा कौम मुलक वास्ते कट मरेगा।' रानी उठी। उन्होने नाना भोपटकर के पैर छुये। कहा, 'एक दिन मैने आपकी राजनीति पर आक्षेप किया था। मुझको क्षमा करना नाना साहव।' फिर एक क्षण वाद बोली, 'भाइयो, मेरी इस क्षणिक दुर्बलता को भूल जाना। मै लडूगी। आज सबके सामने प्रण करती हू कि यदि समस्त अग्रेजो का मुझको अकेले सामना करना पडे, तो करू गी।' उस अत्यन्त हीन परिस्थिति मे भी किले के भीतर वाले नर-नारियो के उमङ्ग का उजाला भर गया। रानी ने कहा, 'थोडा सा खा-पी लो। जो लोग शस्त्र ग्रहण नही कर सकते वे गुप्त मार्ग से निकल जाये शेष मेरे साथ उत्तरी द्वार से भांडेरी फाटक होते हुए कालपी की ओर चले। भांड़ेरी फाटक का प्रबन्ध कौन करेगा?'