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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४१८ झाँसी की रानी मेरे शव को फिरङ्गी स्पर्श करेंगे । इतने से ही मेरे पुरखो का, मेरे विख्यात ससुर का अपमान हो जायगा । अब शिवराम भाऊ की बहू के लिये केवल एक साधन शेष है । बारूद की कोठी में सैकड़ो मन बारूद है। मैं वहा जाती हूँ और पिस्तौल के धड़ाके के साथ अपने पुरखो में मिल जाती हूँ। किले से बाहर जाने के लिये कई गुप्त मार्ग हैं। आप लोग उनसे निकल जाये । अभी सन्ध्या होने में कुछ देर है । रात का काफी अन्धेरा आप लोगो को मिल जायगा ।' भाऊ बख्शी धर्राते हुये कण्ठ से बोला, 'मै भी उसी बारूद के साथ, सरकार की सेवा के लिये यात्रा करूंगा ।' नाना भोपटकर ने तुरन्त कहा, 'आप आत्मघात करने जा रही हैं । यही न ? कृष्ण का पूरा गीता जिसको कण्ठाग्र याद है और जो गीता के अठारहवे अध्याय को अपने जीवन में वर्तती चली आई हैं, और जो प्रत्येक परिस्थिति में स्वराज्य की स्थापना के यज्ञ की वेदी पर संकल्प कर चुकी हैं, वह आत्मघात करेगी ! अङ्गरेज़ो से हमारे पुस्तकालय को भस्म करके जो आघात हमारे कृष्ण को नही पहुँचा पाया है वह आपका आत्मघात पहुचावेगा । करिये कृष्ण का, गीता का अपमान । आप रानी है । आपकी आज्ञा का पालन तो सबको करना ही है । परन्तु आपके उपरान्त देश की जनता आपके लिये क्या कहेगी —जिसकी रक्षा के लिये आपने बीड़ा उठाया था ? रानी ने सिर नीचा कर लिया । वृद्ध भोपटकर कहता गया, 'आप राजमाता हैं। आपके नन्हासा दामोदरराव पुत्र है । वह आपके पुरखो का प्रतीक, झाँसी की आशा है । कालपी में अभी पेशवा की सेना मौजूद है। दिल्ली, लखनऊ, कानपुर इत्यादि के पतन हो जाने पर भी जनता का पतन नही हुआ है । विन्ध्यखण्ड, महाराष्ट्र और अवध अक्षय हैं । किले के भीतर वाले और किले से बाहर दूर दूर वाले पठान देश के लिये कट मरने को कटिबद्ध हैं।