झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४१७ रानी की गोद मोतीबाई के खून से तर हो गई। मोतीबाई का पीला मुर्झाया चेहरा एकदम प्रदीप्त हुआ। आखे अधमुदी हुईं। होठ फड़के उसके मुँह से निकला—'रानी...उजाला.. ला...' और वह मुर्झाया हुआ फूल अनन्त विकास पाकर बिखर गया। मुन्दर ने कहा, 'सरकार, इनको और कु वर खुदाबख्श को एक ही कबर में रक्खा जावे।' रानी बोली, 'ऐसा नही होता और फिर यह कुमारी थी।' तीनो को अलग अलग कबरो मे, परन्तु पास पास दफना दिया गया। अन्त्येष्टि क्रिया गुलमुहम्मद ने की। रघुनाथसिंह ने उन तीनो वीरो को तोप की सलामी दी। सन्ध्या होने को आ रही थी। इसलिये जल्दी जल्दी में चबूतरा इन तीनो का पक्का और एक ही बाघ दिया गया। चबूतरे के ऊपर निशान इन तीनो के अलग अलग बना दिये गये। * इसके उपरान्त रानी ने नहाया-धोया। कपडे बदले, वेश वही पुरुष सैनिक का। महल के नीचे खण्ड में मुख्य मुख्य लोगो को इकट्ठा किया। बोली, 'आज तक आप लोगो ने अप्रतिम वीरता से झासी की रक्षा की। प्राणो की होड लगादी। परन्तु अब चिन्ह अच्छे नही देख पडते हैं। हमारे लगभग सभी सूरमा और दलपति और गोलन्दाज काम आ गये। दीवारो और फाटको के रक्षक वीर मारे गये। किले की चार सहस्र सेना में से उतने सौ भी नही बचे हैं। अङ्गरेजो ने किला घेर लिया है। वे एकाध दिन में ही भीतर आ जावेगे। आप लोगो में से जो लडते लडते बचेगे उनको कैद और फासी होगी। मै पकडी तो नही जा सकती परन्तु *यह चबूतरा महल के दक्षिणी कोने पर अब भी स्थित है। उसकी जियारत होती है और चादरे चढती हैं—लेकिन साल भर में केवल शिवरात्रि के दिन जब किले का यह भाग हिन्दुस्तानियो को सुलभ हो जाता है।