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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 427

४१६ झाँसी की रानी निशाना लेने का सुअवसर था। बुर्जों की मुंडेरे उस दिन के युद्ध में टूट गई थी और उनकी मरम्मत न हो पाई थी। अन्य गोलियाँ तो मोतीबाई के आस पास से निकल गईं, परन्तु एक ने कन्धा नीचे से फोड़ दिया। हृदय उसका बच गया, मृत्यु अवश्यम्भावी थी। उधर से गुलामगौस की लाश आई। इधर से एक सैनिक मोतीबाई को उठा लाया। उसको पानी पिलाया गया। रुधिर बहुतायत से जारी था, परन्तु वह अचेत न थी। मुन्दर ने रानी से दक्षिणी बुर्ज के तोपखाने को सँभालने की अनुमति चाही। रानी ने दृढतापूर्वक इनकार किया, 'नही। यही ठहर। तुझको अब सहज ही नही खोऊँगी।' मोतीबाई का सिर रानी ने अपनी गोद में रख लिया। मोतीबाई की आखो में आसू भर आये। बोली, 'इस गोदी में सिर रक्खे हुये मरना किसी और के भाग्य में नही बाईसाहब।' रानी ने सिर पर हाथ फेरते हुये कहा, 'मेरी मोती तू आज हीरा हुई।' 'सरकार,' मोतीबाई ने व्याकुल स्वर में कहा, 'मैं कुछ भी हूँ परन्तु शुद्ध हूँ।' 'नही तू शुद्ध ही नही,' रानी बोली, 'तू पवित्र है। देख, हीरा एक दिन सबको मरना है, परन्तु सत्कार्य में प्राण देना, भगवान का ध्यान करते करते मरना, यह जन्म भर की अच्छी कमाई से ही प्राप्त होता है।' मोतीबाई ने आख मीची। उसका चेहरा पीला पड गया। रानी ने कहा, 'आत्मा अमर है। शरीर का चाहे जो कुछ हो, वही एक प्रकाश शेष रहता है।' मोतीबाई अचेत हो गई। रानी ने दो कब्रे और तैयार करने के लिये आज्ञा दी। कबरें तुरन्त तैयार हो गईं।