भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ४१५ महल की चौखट पर बैठ कर वह रोईं। लक्ष्मीबाई रोईं ! वह जिसकी आखो ने आसुओ से कभी परिचय भी न किया था ! वह जिसका वक्षस्थल वज्र का और हाथ फौलाद के थे ! वह जिसके कोश में निराशा का शब्द न था ! वह जो भारतीय नारीत्व का गौरव और शान थी ! मानो उस दिन हिन्दुओ की दुर्गा रोई । मुश्किल से आसुओ की अविरल धारा टूटी थी कि रामचन्द्र देशमुख ने कर्तव्य वश समाचार दिया, 'सरकार, कुवर गुलाम गौसखां दुश्मन की गोली से मारे गये ।' रानी सिंहनी की तरह उछल कर खडी हो गईं । अङ्गरखे के छोर से आंसू पोछ डाले । गला साफ किया । आज्ञा दी, 'भाऊ को उनकी जगह भेजो ओर लाश को महल के पास ।' आज्ञा पालन के लिये देशमुख चला गया । रानी मुन्दर को साथ लेकर दक्षिणी बुर्ज के नीचे, जहा खुदाबख्श के शव के लिये कबर तैयार हो चुकी थी, आईं । मोतीबाई वहा थी । पश्चिमी बुर्ज से भाऊ बख्शी अङ्गरेजी शिविर पर धडाधड़ गोलाबारी कर रहा था । केन्द्रीय बुर्ज से रघुनाथसिंह । दक्षिणी बुर्ज शान्त थी । 'मोतीबाई', रानी ने कहा, 'में दफनाने का प्रबन्ध करती हू, तुम तब तक इस बुर्ज के तोपखाने को जगादो ।' खुदाबख्श के शव के मोह मे मोतीबाई जरा ठमठमाई । रानी बोली, 'अभी विलम्ब है । कुंवर गुलाम गौसखा का भी शव यही आ रहा है ।' विस्फारित लोचन मोतीबाई ने विस्मय के साथ कहा, 'क्या उस्ताद मारे गये ?', 'हा मोती,' रानी ने उत्तर दिया । मोतीबाई तोप पर चली गई । पहली बाढ दागी थी कि उस पर नजदीक से गोलियो की बौछार हुई । अंग्रेज किले के सदर फाटक के पास आ गये थे ओर उनको पास से