झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१४ झांसी की रानी 'शाला भी न बची। सुन्दर पर्दे, जिनकी सहायता से शकुन्तला, रत्नावली और हरिश्चन्द्र नाटक खेले जाते थे, खाक कर दिये गये। और इसके बाद जो कुछ हुआ उससे उन बर्बरो की पाशविकता इतिहास में अमिट अक्षरो में लिख ली गई—महल के सामने वाले विशाल पुस्तकालय मे आग लगा दी गई ! थोडी ही देर में कलाओ का वह भंडार अग्नि की गगनभेदी लौ फेकने लगा। कभी रोम, सिकन्दरिया और राज-गृह में भी ऐसा हुआ था, परन्तु वह बर्बर युग था ! और यह विज्ञान का सभ्य युग !! रानी ने किले पर से देखा। उनके हाथ मे दूरबीन न होती तो भी दिखलाई पड सकता था। पर दूरबीन ने सब कुछ स्पष्ट दृष्टिगोचर करा दिया। अस्तबल मिटा—फिर बन सकता था। राजमहल जला—उसके बनाने वाले फिर उत्पन्न हो जायंगे। लेकिन पुस्तकालय ? वेद, शास्त्र, पुराण, काव्य, इतिहास इत्यादि सस्कृति के और अरबी-फारसी के अनेक हस्तलिखित ग्रन्थ जिनको प्रतिलिपि करने के लिये दूर दूर के विद्याव्य- सनी आते थे, फिर कौन पैदा करेगा ? रानी का माथा घूमने लगा। जिसको किसी कष्ट किसी समस्या, किसी विपत्ति ने कभी नही हिला पाया था, वह जलते हुये पुस्तकालय को देखकर मूर्च्छित होने को हुई। मुन्दर साथ थी। उसने संभाल लिया। रानी ने प्रबल प्रयत्न करके मूर्छा को दूर किया। पानी मँगवाया, पिया। इतने में हलवाईपुरा और कोरियो के मुहल्ला की आगो की लपटे दिखलाई दी। क्रन्दन, पुकार और चीत्कार की समग्र ध्वनिया यकायक सुनाई पडी। जन-वध, कतले-ग्राम, लोक-सहार का प्रत्यक्ष प्रमाण। रानी का हृदय धसने लगा। 'मुन्दर, मुन्दर, मेरी प्यारी झासी की यह कुगति, यह दुर्गति ! और मेरे जीतेजी ! मेरी आंखो के सामने !' रानी ने भरे गले से कहा। गला फटसा गया। मुन्दर उनको खींचकर नीचे ले आई।