झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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पौ फटते ही घोड़े पर बैठी और ऐंठ के साथ अङ्गरेज़ी छावनी की ओर चल दी। साथ में कोई हथियार न लिया। चोली में केवल एक छुरी रख ली। थोड़ी ही दूर पर गोरो का पहरा मिला। टोकी गई। झलकारी को अपने भीतर भाषा और शब्दो की कमी पहले पहल जान पड़ी। परन्तु वह जानती थी कि गोरो के साथ चाहे जैसा भी बोलने में कोई हानि न होगी। झलकारी ने टोकने के उत्तर में कहा, 'हम तुम्हारे जडैल के पास जाउता हैं।' यदि कोई हिन्दुस्थानी इस भाषा को सुनता तो उसको हंसी बिना आये न रहती। एक गोरा हिन्दी के कुछ शब्द जानता था। बोला, 'कौन ?' 'रानी—झांसी की रानी, लक्ष्मीबाई,' झलकारी ने बड़ी हेकड़ी के साथ जवाब दिया। गोरो ने उसको घेर लिया। उन लोगो ने आपस में तुरन्त सलाह की। 'जनरल रोज़ के पास अविलम्ब ले चलना चाहिये।' उसको घेरकर गोरे अपनी छावनी की ओर बढे। शहर भर के गोरो में हल्ला फैल गया कि झाँसी की रानी पकड़ ली गई। गोरे सिपाही खुशी में पागल हो गये। उनसे बढकर पागल झलकारी थी। उसको विश्वास था कि मेरी जाच-पड़ताल और हत्या में जब तक अङ्गरेज़ उलझेंगे तब तक रानी को इतना समय मिल जावेगा कि काफी दूर निकल जावेगी और बच जावेगी।