झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२६ झांसी की रानी झलकारी रोज़ के सामने पहुंचाई गई । वह घोडे से नही उतरी । रानियो की सी शान, वैसा ही अभिमान, वही हेकड़ी । रोज़ भी कुछ देर के लिये धोखे में आ गया । शकल सूरत वैसी ही सुन्दर । केवल रङ्ग वह नही था । रोज़ ने स्टुअर्ट से कहा, 'हाउ हैन्डसम, दो डार्क एण्ड टैरिबिल, (कितनी सुन्दर है, यद्यपि श्यामल और भयानक) स्टुअर्ट बोला, 'लैफ्टिनेंट बोकर को सदल व्यर्थ ही भेजा ।' परन्तु छावनी में राव दूल्हाजू था । वह खबर पाकर तुरन्त एक श्राड में आया । उसने बारीकी के साथ देखा । रोज़ के पास आकर दूल्हाजू बोला, 'यह रानी नही है जनरल साहब । झलकारी कोरिन है । रानी इस प्रकार सामने नही आ सकती ।' झलकारी ने दूल्हाजू को पहिचान लिया । उसको क्रोध आ गया और वह अपना अभिनय नितान्त भूल गई । क्रुद्ध स्वर में बोली, 'अरे पापी, ठाकुर होकें तैंने जौ का करो ।' दूल्हाजू जिमीन में गड सा गया । रोज़ को झलकारी की वास्तविकता समझाई गई । रोज़ के मुंह से निकला, 'यह औरत पागल हो गई है ।' रोज़ ने झलकारी को घोडे पर से उतरवाया । रोज़—'तुम रानी नही हो । झलकारी कोरिन हो । तुमको गोली मारी जायगी ।' झलकारी ने निर्भय होकर कहा, 'मार दै, मैं का मरबे खो डरात हो ? जैसे इत्ते सिपाही मरे तैमै एक मैं सही ।' रोज ने झलकारी के पागलपने का कारण तलाश किया । मालूम होने पर दङ्ग रह गया । स्टुअर्ट बोला, 'शी इज मैड (वह पागल है) ।'