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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ४६७ 'धाय धाय' बन्दूक चलाई । 'धाय धाय' अंग्रेजी रिसाले का जवाब आया । काफी समय तक रिसाले के सैनिको को हताहत करता रहा । फिर ? एक गोली से मारा गया । चिता 'साय-साय' जलती रही । गुलमुहम्मद चिता से कुछ दूर जाकर लेट गया । साफे के टुकडे से अपने को ढका । बेहद थका हुआ था, सो गया । सवेरे जब आँख खुली देखा कि चिता के स्थान पर कुछ जली हड्डिया बाकी रह गई हैं । उसके मुँह से निकल पडा, 'ओफ रानी साहब का सिर्फ यह हड्डी रह गया है ! और उस हसीन लडकी का !' फिर तुरन्त उसने अपने मन में कहा, 'ओ कबी नही । वो मरा नहीं । वो कबी नई मरेगा । वो मुर्दों को जान बख्शता रहेगा ।' चिता के ठडे हो जाने पर गुलमुहम्मद ने उस स्थान पर एक चबूतरा बाधा और कही से फूल लाकर उस पर चढाये । अंग्रेजी सेना का एक दल रानी की ढूँढ खोज में वहाँ पर आया । चबूतरा अभी सूखा न था । उस दल के अगुआ का कुतूहल जागा । गुलमुहम्मद से उसने पूछा, ' यह किसका मज़ार है साई साहब ?' गुलमुहम्मद ने उत्तर दिया, 'अमारे पीर का, वो बोत बड़ा वली था ।'