झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 509, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें४६६ झाँसी की रानी रघुनाथसिंह पागलो का सा हँसा । गुलमुहम्मद ने एक क्षण सोचा । बोला, 'यह फकीर साहब हड्डियों की हिफाजत करेगा ।' रघुनाथसिंह ने कहा, 'फकीर नही करेगा । आप चाहे तो कर सकते है ।' 'अच्छा,' गुलमुहम्मद बोला, 'अम जिन्दा रहेगा । खाक और हड्डियों पर चबूतरा बना देगा ।' 'अपनी बन्दूक भी मुझको देदो कु वर साहब, रघुनाथसिंह ने प्रस्ताव किया ।' गुलमुहम्मद ने प्रतिवाद किया, 'अब कुँवर साहब नही । अम फकीर बनकर रहेगा । गुलसाईं नाम होगा ।' उसने अपनी बन्दूक दे दी । 'इसको भर दीजिये', रघुनाथसिंह ने अनुरोध किया । 'बस बाई । अब बन्दूक या कोई हथियार नही छुयेगा अम खुदापाक की याद में बाकी जिन्दगी खतम करेगा ।' एक तरफ जाकर गुलमुहम्मद ने अपनी वर्दी जलती हुई चिता पर फेंककर खाक कर दी —केवल साफा रक्खा । उसके एक टुकड़े की लँगोटी लगाई । बाकी ओढने विछाने को रख लिया । खूब हँसकर बोला, 'अब अम बिलकुल आज़ाद हो गया बाई ।' रघुनाथसिंह ने दोनो बन्दूके भर ली । गोली बारूद के, झोले लटकाये गुलमुहम्मद के पास गया उसको देखकर विस्मित हुआ । बोला, आप तो सचमुच फकीर हो गये ! अच्छा सलाम कुँवर, साईं साहब । भूल चूक गलती माफ कीजिये ।' 'सलाम,' गुलमुहम्मद ने कहा । जिस ओर से टापो का शब्द आ रहा था रघुनाथसिंह उसी दिशा में गया । पास जाकर एक आड ली । लेट गया । प्रतीति करली कि अग्रेजो का रिसाला है और कुटी की ओर आ रहा है।