भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 508

लक्ष्मीबाई ४६५ [ ९३ ] कुछ दूरी पर रिसाले की टापो का शब्द सुनाई पडा । वह रिसाला अग्रेज़ो का था । देशमुख—'रानी साहव की तलाश में बैरी घूम रहे हैं।' रघुनाथसिंह—'आप दामोदरराव को लेकर तुरन्त निकल जाइये।' देशमुख—'आप दीवान साहब क्या झाँसी की ओर जायेगे ?' रघुनाथसिंह--'झांसी में मेरा अब क्या रक्खा है। मै इन सवारो को मार कर मरूँगा। ये लोग चिता की ओर आयेंगे। इसे उसेलेंगे। जाइये तुरन्त जाइये। रात को कही छिप जाना . विश्राम करना।' देशमुख---'कठे का क्या होगा ?' रघुनाथसिंह—'मृत सिपाहियो के बाल बच्चो मे बाट देना या कुछ भी करना।' देशमुख ने दामोदरराव को पीठ पर बाधा और घोडे पर सवार होकर चल दिया। रघुनाथसिंह ने गुलमुहम्मद से कहा, 'कुँवर साहब आप भी जाइये। मेरे घोडे को छोड़ दीजिये, उस विचारे को कोई न कोई रख लेगा। आवरे में से मेरी बन्दूक और गोली वारूद का झोला लाने की कृपा करिये।' गुलमुहम्मद घोडे के पास गया। दोनो के आवरो में से गोली बारूद और बन्दूकें निकाल ली। और, दोनो घोडो को जीन सहित छोड दिया। गुलमुहम्मद ने रघुनाथसिंह को बन्दूक और गोली बारूद देते हुये कहा, 'दीवान साहब, अम कहा जायगा ? अम राहतगढ से जब चला तब पाचसौ पठान था। अब एक रह गया। अकेला कहा जायगा ? अम भी मारेगा और मरेगा। बाई, अमको मत हटाओ।' रघुनाथसिंह ने कहा, 'मै चाहता हू आप जिन्दा रहे, और इनकी पवित्र हड्डियो और भस्म को किसी गैर को न छूने दे। रहा मे सोजांने की बहुत जल्दी पड रही है। वे अभी रास्ते में होगे उनमे जल्दी मिलना है, और बन्दूकें भरने लगा।