झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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४६४ झाँसी की रानी बोले, 'बस और कुछ नही है। जल्दी करो।' दोनो शवो को बाहर रखकर, दामोदरराव को एक ओर बिठलाया और वे तीनो सिपाही कुटी को उधेड़ने में लग गये। बात की बात में कुटी को तोडकर लकडी इकट्ठी करली । गन्जी की कुछ घास घोडो को डाल दी और कुछ से चिता का काम लिया। रानी का कठा उतार कर दामोदरराव के पास रख दिया।, मोतियो की एक छोटी कठी उनके गले में रहने दी। उनका कवच और तवे भी। चिता पर देशमुख ने रख दिया और अग्नि संस्कार कर दिया। अपनी और रघुनाथसिंह की वर्दिया भी चिता पर रखदी। आधी घड़ी में चिता प्रज्वलित हो गई। उस कुटी की भूमि पर रक्त वह गया था। उसको देशमुख ने धो डाला। परन्तु उन रक्त की बूंदो ने पृथ्वी पर जो इतिहास लिख दिया था वह अमिट रहा।