झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४६३ [ ६२ ] बाबा गंगादास ने सचेत किया, 'झाँसी की रानी के सिधार जाने को अस्त होना कहते हो ! यह तुम्हारा मोह है । वह अस्त नही हुई । वह अमर हो गईं । कायरता का त्याग करो । उस घास की गञ्जी पर इन दोनो देवियो के शवो का दाह सस्कार करो अंग्रेज़ इन लोगो की खोज में आते होगे । शीघ्रता करो ।' वे दोनो संभले । देशमुख ने कहा, 'घास की गञ्जी बडी है ?' बाबा गंगादास ने उत्तर दिया, 'गञ्जी तो छोटी सी है ।' देशमुख कष्टपूर्ण स्वर में बोला, 'झाँसी की रानी के दाह के लिये आज लकडी भी सुलभ नही ! घास की अग्नि तो इन दो शवो को केवल झोस देगी । सवेरे शत्रु इनके अर्धदग्ध शरीर देखेगे, हँसेगे और शायद कही फेक देंगे ।' बाबा ने सिर उठाकर अपनी कुटिया को देखा । बोले, 'इस कुटिया में काफी लकड़ी है । उधेड़ डालो । अन्त्येष्टि का आरम्भ करो ।' रघुनाथसिंह ने प्रार्थना की, आपकी कुटी की लकडी ! आप एक कृपा करें तो ।' बाबा ने पूछा, 'क्या ?' रघुनाथसिंह ने उत्तर दिया, 'फिर से कुटी बनाने में आपको असुविधा होगी, इसलिये कुछ भेट ग्रहण करली जावे ।' बाबा मुस्कराये । बोले, 'यह लकडी मेरी नही है । जिन्होने पहले दी थी वे फिर दे, देंगे । देर मत करो । कुटिया को उधेड़ो ।' देशमुख ने कहा, 'उसमें का सामान बाहर निकाल लिया जाय ।' बाबा भीतर से एक कम्बल, तूंबी, चटाई और लगोटी उठालाये ।