झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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४६२ झांसी की रानी । ॰ ॰ द ॰ ह ॰ ति ॰॰॰ नै ॰॰ य ॰॰॰ पावक.'मुख मडल प्रदीप्त हो गया । – सूर्यास्त हुआ । प्रकाश का अरुण पुञ्ज दिशा की भाल पर था । उसकी अगणित रेखाये गगन में फैली हुई थी । देशमुख ने बिलख कर कहा, 'झासी का सूर्य अस्त हो गया ।' रघुनाथसिंह बिलख बिलख कर रोने लगा । दामोदरराव ने चीत्कार किया । बाबा गगादास ने कहा, 'प्रकाश अनन्त है । वह कण कण को भासमान कर रहा है । फिर उदय होगा । फिर प्रत्येक कण मुखरित हो उठेगा ।'