भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ४६१ [ ६१ ] विसूरते हुये दामोदरराव को एक ओर बिठला कर रामचन्द्रराव ने अपनी वर्दी पर रानी को लिटा दिया और बचे हुये साफे के टुकडे प उनके सिर के घाव को बाधा । रघुनाथसिंह ने अपनी वर्दी पर मुन्दर के शव को रख दिया । गुलमुहम्मद ने घोडे को जरा दूर पेडो से जा अटकाया । बाबा गंगादास ने पहिचान लिया । बोले, 'सीता और सावित्री के देश की लडकिया हैं ये ।' रानी ने पानी के लिये मुँह खोला । बाबा गंगादास तुरन्त गंगाजल ले आये । रानी को पिलाया । उनको कुछ चेत आया । मुँह से पीडित स्वर मे धीरे से निकला, 'हर हर महादेव ।' उनका चेहरा कष्ट के मारे बिलकुल पीला पड गया । अचेत हो गई । बाबा गंगादास ने पश्चिम की ओर देखकर कहा, 'अभी कुछ प्रकाश है । परन्तु अधिक विलम्ब नही । थोडी दूर घास की एक गञ्जी लगी हुई है । उसी पर चिता बनाओ । मुन्दर की ओर देखकर बोले, 'यह इस कुटी में रानी लक्ष्मीबाई के साथ कई बार आई थी । इसका तो प्राणान्त हो गया है ।' रघुनाथसिंह के रुद्ध कण्ड से केवल 'जी' निकला । उसके मुँह में भी बाबा ने गंगाजल की कुछ बूँदें डाली । रानी फिर थोडे से चेत में आईं कम से कम रघुनाथसिंह इत्यादि को यही जान पडा । दामोदरराव पास आ गया । उसको अवगत हुआ कि मा बच गई और फिर खड़ी हो जायगी । उत्सुकता के साथ उनकी ओर टकटकी लगाई । रानी के मुँह से बहुत टूटे स्वर में निकला, 'ओ३म् वासुदेवाय नम इसके उपरान्त उनके मुँह से जो कुछ निकला वह अस्पष्ट था । होठ हिल रहे थे । वे लोग कान लगाकर सुनने लगे । उनकी समझ में केवल तीन टूटे शब्द आये • '