झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६० झाँसी की रानी रघुनाथसिंह ने देशमुख से कहा, 'एक क्षण का भी विलम्ब नही होना चाहिये। अपने घोडे पर इनको होशियारी के साथ रक्खो और बाबा गङ्गादास की कुटी पर चलो। सूर्यास्त हुआ ही चाहता है।' देशमुख का गला रुँधा हुआ था। बालक दामोदरराव अपनी माता के लिये चुपचाप रो रहा था। रामचन्द्र ने पुचकार कर कहा, 'इनकी दवा करेगे, अच्छी हो जायेगी, रोओ मत।' रामचन्द्र ने रघुनाथसिंह की सहायता से रानी को सँभालकर अपने घोडे पर रक्खा। रघुनाथसिंह ने गुलमुहम्मद से कहा, कुँवर साहब, इस कमज़ोरी से काम और बिगडेगा। याद करिये, अपने मालिक ने क्या कहा था। अङ्गरेज अब भी मारते काटते दौड धूप कर रहे हैं। यदि आ गये तो रानी साहब की देह का क्या होगा? गुलमुहम्मद चौक पडा। साफे के छोर से आँसू पोछे। गला बिलकुल सूख गया था। आगे बढने का इशारा किया। वे सब द्रुतगति से बाबा गङ्गादास की कुटी पर पहुँचे।