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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 526 में से

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लक्ष्मीबाई ४८६ आया। रानी ने दाएँ हाथ के वार से उसको समाप्त कर दिया। उस सवार के पीछे से एक और आगे निकल पड़ा। रानी ने आगे बढ़ने के लिये फिर एक पैर की एड लगाई। घोड़ा बहुत प्रयत्न करने पर भी अड़ा रहा। वह दो पैरो से खड़ा हो गया। रानी को पीछे खिसकना पड़ा। एक जाँघ काम नही कर रही थी। बहुत पीडा थी। खून के फव्वारे पेट और जाघ के घाव से छूट रहे थे। गुलमुहम्मद आगे बढ़े हुये अङ्गरेज सवार की ओर लपका। परन्तु अङ्गरेज सवार ने गुलमुहम्मद के आ पहुँचने के' पहले ही तलवार का वार रानी के सिर पर किया। वह उनकी दाई ओर पड़ा। सिर का वह हिस्सा कट गया और दाईं आंख बाहर निकल पड़ी। इसपर भी उन्होने अपने घातक पर तलवार चलाई और उसका कधा काट दिया। गुलमुहम्मद ने उस सवार के ऊपर कसकर भरपूर हाथ छोड़ा। उसके दो टुकड़े हो गये। बाकी दो तीन अंगरेज सवार बचे थे। उनपर गुलमुहम्मद बिजली की तरह टूटा। उसने एक को घायल कर दिया। दूसरे के घोड़े को लगभग अधमरा। वे तीनो मैदान छोड़कर भाग गये। अब वहा कोई शत्रु न था। जब गुलमुहम्मद मुड़ा तो उसने देखा—रामचन्द्र देशमुख घोड़े से गिरती हुई रानी को साधे हुये है। दिन भर के थके मांदे, भूखे-प्यासे, धूल और खून में सने हुये गुलमुहम्मद ने पश्चिम की ओर मुँह फेर कर कहा, 'खुदा, पाक परवर- दिगार, रहम, रहम !' । उस कट्टर सिपाही की आँखे आसुओ को मानो बरसाने लगी और ह बच्चो की तरह हिलक हिलक कर रोने लगा। रघुनाथसिंह और देशमुख ने रानी को घोड़े पर से संभाल कर उतारा 'वेश में आकर उस अडियल घोड़े को एक लात मारी। वह अपने ॠवल की दिशा में भाग गया।

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