झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८८ झाँसी की रानी रघुनाथसिंह पास था। रानी ने कहा, 'मेरी देहं को अङ्गरेज न छूने पावे।' गुलमुहम्मद ने भी सुना—और समझ लिया। वह और भी जोर से लड़ा। एक अङ्गरेज सवार ने मुन्दर पर पिस्तौल दागी। उसके मुँह से केवल ये शब्द निकले : 'बाईसाहब, मै मरी। मेरी देह... भगवान्।' अन्तिम शब्द के साथ उसने एक दृष्टि रघुनाथसिंह पर डाली और वह लटक गई। रानी ने मुस्काकर देखा। रघुनाथसिंह से कहा, 'संभालो उसे। उसके शरीर को वे छूने पावे।' और वे घोडे को मोड़कर अङ्गरेज सवारो पर तलवारो की बौछार करने लगी। कई कटे। मुन्दर का मारने वाला मारा गया। रघुनाथसिंह फुर्ती के साथ घोडे से उतरा। अपना साफा फाडा। मुन्दर के शव को पीठ पर कसा और घोडे पर सवार होकर आगे बढा। गुलमुहम्मद बाकी सवारो से उलझा। रानी ने फिर सोनरेखा नाले की ओर घोडे को बढाया। देशमुख साथ हो गया। अङ्गरेज सवार चार पाच रह गये थे। गुलमुहम्मद उनको बहकावा देकर रानी के साथ हो लिया। रानी तेजी के साथ नाले की ढीपर आ गईं। घोडे ने आगे बढने से इनकार कर दिया—बिलकुल अड गया। रानी ने पुचकारा। कई प्रयत्न किये, परन्तु सब व्यर्थ। वे अङ्गरेज़ सवार आ पहुँचे। एक गोरे ने पिस्तौल निकाली और रानी पर दागी। गोली उनकी बाई जघा में पडी। वे गले में मोती-हीरो का दमदमाता हुआ कण्ठा पहिने हुई थी। उस अङ्गरेज सवार ने रानी को कोई बडा सरदार समझ कर विश्वास कर लिया कि अब वह कण्ठा मेरा हुआ। रानी ने बाये हाथ की तलवार फेक कर घोडे की अयाल पकड़ी और दूसरी जांघ तथा हाथ की सहायता से अपना आसन सँभाला इतने में वह सवार और भी निकट