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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ४८७ मुन्दर रानी के साथ थी । अगल-बगल रघुनाथसिंह और रामचन्द्र देशमुख । पीछे कुँवर गुलमुहम्मद और केवल बीस-पच्चीस अवशिष्ट लाल सवार । अङ्गरेजो ने थोडी देर में इन सबके चारो तरफ घेरा डाल दिया । सिमट सिमटकर उस घेरे को कम करते जा रहे थे । परन्तु रानी की दुहत्थू तलवारे आगे का मार्ग साफ करती चली जा रही थी । पीछे के वीर सवारो की संख्या घटते घटते नगण्य हो गई । उसी समय तात्या ने रुहेली और अवधी सैनिको की सहायता से अङ्गरेजो के व्यूह पर प्रहार किया । तात्या कठिन से कठिन व्यूह में होकर बच निकलने की रणविद्या का पारङ्गत पण्डित था । अङ्गरेज थोडे से सवारो को लालकुर्ती का पीछा करने के लिये छोडकर तात्या की ओर मुड गये । सूर्यास्त होने में कुछ बिलम्ब था । लालकुर्ती का अंतिम सवार मारा गया । रानी के साथ केवल चार सरदार और उनकी तलवारे रह गई । पीछे कडाबीन और तलवार वाले दस-पन्द्रह गोरे सवार । आगे सङ्गीन वाले कुछ गोरे पैदल । रानी ने पीछे की तरफ देखा - रघुनाथसिंह और गुलमुहम्मद तलवार से अङ्गरेज सैनिको की संख्या कम रहे हैं । एक ओर रामचन्द्र देशमुख दामोदरराव की रक्षा की चिंता में बरकाव कर करके लड़ रहा था । रानी ने देशमुख की सहायता के लिये मुन्दर को इशारा किया, और वह स्वय सगीनबरदारो को दोनो हाथो की तलवारो से खटाखट साफ करके आगे बढने लगी । एक सगीनबरदार की हूल रानी के सीने के नीचे पडी । उन्होंने उसी समय तलवारो से उस सगीनबरदार को खतम किया । हूल करारी थी, परन्तु आतें बच गई । रानी ने सोचा, 'स्वराज्य की नीव का पत्थर बनने जा रही हू ।' रानी के खून बह निकला । उस सगीनबरदार के खतम होते ही बाकी भागे । रानी आगे निकल गई । उनके साथी भी दायें, बायें और पीछे । आठ-दस गोरे घुडसवार उनको पछियाते हुये ।