झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४८७ मुन्दर रानी के साथ थी । अगल-बगल रघुनाथसिंह और रामचन्द्र देशमुख । पीछे कुँवर गुलमुहम्मद और केवल बीस-पच्चीस अवशिष्ट लाल सवार । अङ्गरेजो ने थोडी देर में इन सबके चारो तरफ घेरा डाल दिया । सिमट सिमटकर उस घेरे को कम करते जा रहे थे । परन्तु रानी की दुहत्थू तलवारे आगे का मार्ग साफ करती चली जा रही थी । पीछे के वीर सवारो की संख्या घटते घटते नगण्य हो गई । उसी समय तात्या ने रुहेली और अवधी सैनिको की सहायता से अङ्गरेजो के व्यूह पर प्रहार किया । तात्या कठिन से कठिन व्यूह में होकर बच निकलने की रणविद्या का पारङ्गत पण्डित था । अङ्गरेज थोडे से सवारो को लालकुर्ती का पीछा करने के लिये छोडकर तात्या की ओर मुड गये । सूर्यास्त होने में कुछ बिलम्ब था । लालकुर्ती का अंतिम सवार मारा गया । रानी के साथ केवल चार सरदार और उनकी तलवारे रह गई । पीछे कडाबीन और तलवार वाले दस-पन्द्रह गोरे सवार । आगे सङ्गीन वाले कुछ गोरे पैदल । रानी ने पीछे की तरफ देखा - रघुनाथसिंह और गुलमुहम्मद तलवार से अङ्गरेज सैनिको की संख्या कम रहे हैं । एक ओर रामचन्द्र देशमुख दामोदरराव की रक्षा की चिंता में बरकाव कर करके लड़ रहा था । रानी ने देशमुख की सहायता के लिये मुन्दर को इशारा किया, और वह स्वय सगीनबरदारो को दोनो हाथो की तलवारो से खटाखट साफ करके आगे बढने लगी । एक सगीनबरदार की हूल रानी के सीने के नीचे पडी । उन्होंने उसी समय तलवारो से उस सगीनबरदार को खतम किया । हूल करारी थी, परन्तु आतें बच गई । रानी ने सोचा, 'स्वराज्य की नीव का पत्थर बनने जा रही हू ।' रानी के खून बह निकला । उस सगीनबरदार के खतम होते ही बाकी भागे । रानी आगे निकल गई । उनके साथी भी दायें, बायें और पीछे । आठ-दस गोरे घुडसवार उनको पछियाते हुये ।