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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४८६ झाँसी की रानी जूही की क्षीण मुस्कराहट जो उसके ओठो पर अनन्त दिव्यता की गोद मे खेल गई । वर्दी के कट जाने पर हुजरो ने देखा कि तोपखाने का अफसर गोरे रङ्ग की एक सुन्दर युवती थी ! और उसके ओठो पर मुस्कराहट थी !! समाचार मिलते ही रानी ने इस तोपखाने का प्रबन्ध किया । इतने में ब्रिगेडियर स्मिथ ने अपने छिपे हुये पैदलो को छिपे हुये स्थानो से निकाला । वे संगीने सीधी किये रानी के पीछे वाली पैदल पल्टन पर दो पार्श्वों से झपटे । पेशवा की पैदल पल्टन घबरा गई । उसके पैर उखडे । भाग उठी । रानी ने प्रोत्साहन, उत्तेजन दिया । परन्तु उनके और उस भागती हुई पल्टन के बीच में गोरो की संगीनें और हुज़रो के घोडे आचुके थे । अङ्गरेजो की कडाबीने, संगीनें और तोपें पेशवाई सेना का सहार कर उठी । पेशवा की दो तोपे भी उन लोगो ने छीनली । अङ्गरेजी सेना बाढ पर आई हुई नदी की तरह बढने और फैलने लगी । रानी की रक्षा के लिये लालकुर्ती सवार अटूट शौर्य और अपार विक्रम दिखलाने लगे । न कडाबीन की परवाह, न संगीन का भय और तलवार तो मानो उनकी ईश्वरीय देन थी । उस तेजस्वी दल ने घण्टो अङ्गरेजो का प्रचण्ड सामना किया । रानी धीरे धीरे पश्चिम-दक्षिण की ओर अपने मोर्चे की शेष सेना से मिलने के लिये मुडी । यह मिलान लगभग असंभव था, क्योकि उस भागती हुई पैदल पल्टन और रानी के बीच में बहुसंख्यक हुज़र सवार और संगीन बरदार पैदल थे । परन्तु उन बचे खुचे लालकुर्ती वीरो ने अपनी तलवारो की आड़ बनाई । रानी ने घोडे की लगाम अपने दातो में थामी और दोनो हाथो से तलवार चलाकर अपना मार्ग बनाना आरभ कर दिया । दक्षिण-पश्चिम की ओर सोनरेखा नाला था । आगे चलकर बाबा गङ्गादास की कुटी थी । कुटी के पीछे दक्षिण और पश्चिम की ओर हटती हुई पेशवाई पैदल पल्टन ।