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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 498, कुल 526 में से

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पृष्ठ 498

लक्ष्मीबाई ४८५ की योजना की। तोपे पीठ पर रक्षा के लिये थी ही हुजूर सवारो ने पहला हमला कडाबीन बन्दूको से किया। बन्दूको का जवाब बन्दूको से दिया गया। रानी ने आक्रमण पर आक्रमण करके हुजूर सवारो को पीछे हटाया। दोनो ओर के सवारो की बेहिसाब दौड से धूल के बादल छा गये। रानी के रणकौशल के मारे अग्ररेज जनरल थर्रा गये। काफी समय हो गया, परन्तु अङ्गरेजो को पेशवाई मोर्चों में निकल जाने की गुन्जायश न मिली। जूही की तोपे गज़ब ढा रही थी। अङ्गरेज नायक ने इन तोपो का मुहँ बन्द करना तै किया। हुजर सवार बढते जाते थे, मरते जाते थे, परन्तु उन्होने इस तरफ की तोपो को चुप करने का निश्चय कर लिया था। रानी ने जूही की सहायता के लिये कुमुक भेजी। उसी समय उनको खबर मिली कि पेशवा की अधिकांश ग्वालियर सेना और सरदार 'श्रा ने महाराज' की शरण मे चले गये। मुन्दर ने रानी से कहा, 'सवेरे अस्तबल का प्रहरी रिस रिस कर अपने 'सरकार' का स्मरण कर रहा था। मुझे सन्देह हो गया था कि ग्वालियरी कुछ गडबड करेंगे।' 'गाठ में समय न होने के कारण कुछ नही किया जा सकता था,' रानी बोली, 'अब जो कुछ संभव है वह करो।' इनकी लालकुर्ती अव तलवार खीचकर आगे बढी। उस धूल घूरसित प्रकाश में भी तलवारो की चमचमाहट ने चकाचौध लगा दी। कुछ ही समय उपरान्त समाचार मिला कि ग्वालियरी सेना के, परपक्ष में मिल जाने के कारण रावसाहब के दो मोर्चे छिन गये और अङ्गरेज उनमे से घुसने लगे हैं। रानी के पीछे पैदल पल्टन थी। उसको स्थिति संभालने की आज्ञा देकर वह एक ओर आगे बढी। उधर हुज़र- सवार जूही के तोपखाने पर जा टूटे। जूही तलवार से भिड गई। घिर गई और मारी गई। मरते समय उसने आह तक नही की। चिर गई थी। परन्तु शत्रु की तलवार चीरने में, जिस बातमें असमर्थ रही-वह थी