झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८४ झाँसी की रानी मुन्दर घोडा ले आई । उसकी आखे छलछला रही थी । पूर्व दिशा में अरुणमा फैल गई । अबकी बार कई तोपो का घडाका हुआ । रानी मुस्कराईं । बोली, 'यह तात्या की तोपो का जवाब है ।' मुन्दर की छलकती हुई आखो को देखकर कहा, 'यह समय आसुओ का नही है, मुन्दर । जा, तुरन्त अपने घोडे पर सवार हो ।' अपने लिये आये हुये थोडे को देखकर बोली, 'यह अस्तबल को प्यार करने वाला जानवर है । परन्तु अब दूसरे को चुनने का समय ही नही है । इसी से काम निकालू गी ।' जूही के सिर पर हाथ फेर कर कहा, 'जा जूही अपने तोपखाने पर । छका तो दे इन बैरियो को आज ।' जूही ने प्रणाम किया । जाते हुये कह गई, 'इस जीवन का यथोचित अभिनय आपको न दिखला पाया । खैर ।' अङ्गरेज़ो के गोलो की वर्षा हो उठी । रानी के सब सरदार और सवार घोडो पर जम गये, जूही का तोपखाना आग उगलने लगा । इतने में सूर्य का उदय हुआ । सूर्य की किरणो ने रानी के सुन्दर मुख को प्रदीप्त किया । उनके नेत्रो की ज्योति दुहरे चमत्कार से भासमान हुई । लाल वर्दी के ऊपर मोती- हीरो का कठा दमक उठा और, चमक पडी म्यान से निकली हुई तलवार । रानी ने घोडे को एड लगाई । पहले ज़रा हिचका फिर तेज हो गया । रानी ने सोचा कई दिन का बँधा होगा, थोडी देर में गरम हो जायगा । उत्तर और पश्चिम की दिशाओ में तात्या और रावसाहब के मोर्चे थे । दक्षिण में बादा के नवाब का, रानी ने पूर्व की ओर झपट लगाई । गत दिवस की हार के कारण अङ्गरेज जनरल सावधान और चिंतित हो गये थे । इन लोगो ने अपनी पैदल पलटने पूर्व और दक्षिण के बीहड में छिपा ली और हुज़र* सवारो को कई दिशाओ से आक्रमण करने *Hussars