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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 496

लक्ष्मीबाई | ४८३

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मुन्दर और रघुनाथसिंह ने कुछ भी न खाकर जेबो में कलेवा डाला और पीठ पर पानी का बर्तन कस लिया । झटपट शर्बत बनाया । मुन्दरबाई', रघुनाथसिंह ने कहा, 'रानी साहब का साथ एक क्षण के लिये भी न छूटने पावे । वे आज अंतिम युद्ध लडने जा रही हैं ।' मुन्दर—'आप कहा रहेगे ?' रघुनाथसिंह—'जहा उनकी आज्ञा होगी । वैसे आप लोगो के समीप ही रहने का प्रयत्न करू गा ।' मुन्दर—'में चाहती हूँ आप बिलकुल निकट रहे । मुझे लगता है में आज मारी जाऊँगी । आपके निकट होने से शान्ति मिलेगी ।' रघुनाथसिंह—'मैं भी नही बचूँगा । रानी साहव को किसी प्रकार सुरक्षित रखना है । मै तुम्हे तुरन्त ही स्वर्ग मे मिलूंगा । केवल आगे पीछे की बात है ।' वह जरा सूखी हँसी हँसा । मुन्दर ने रघुनाथसिंह की ओर आँसू भरी आँखो से देखा । कुछ कहने के लिये होठ हिले । रघुनाथसिंह की आँखे भी धुंधली हुईं । दूर से दुश्मन के बिगुल के शब्द की भाई कान में पडी । मुन्दर ने रघुनाथसिंह को मस्तक नवाकर प्रणाम किया और उस ओट मे जल्दी आँसू पोछ डाले । रघुनाथसिंह ने मुन्दर को नमस्कार किया फिर तुरन्त दोनो शर्बत लिये हुये रानी के पास पहुँचे । मुन्दर ने जूही को पिलाया, रघुनाथसिंह ने रानी को । अङ्गरेजो की बिगुल का साफ शब्द सुनाई दिया । तोप का धडाका हुआ, गोला सन्ना- कर ऊपर से निकल गया । रानी ने दूसरा कटोरा नही पी पाया । रानी ने रामचन्द्र देशमुख को आदेश किया, 'दामोदर को आज तुम पीठ पर बाधो । यदि में मारी जाऊँ तो इसको किसी तरह दक्षिण सुरक्षित पहुंचा देना । तुमको आज मेरे प्राणो से बढकर अपनी रक्षा की चिन्ता करनी होगी । दूसरी बात यह है कि मारी जाने पर ये विधर्मी मेरी देह को न छूने पावे । बस । घोडा लाओ ।'

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