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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

लक्ष्मीबाई ४८६ आया। रानी ने दाएँ हाथ के वार से उसको समाप्त कर दिया। उस सवार के पीछे से एक और आगे निकल पड़ा। रानी ने आगे बढ़ने के लिये फिर एक पैर की एड लगाई। घोड़ा बहुत प्रयत्न करने पर भी अड़ा रहा। वह दो पैरो से खड़ा हो गया। रानी को पीछे खिसकना पड़ा। एक जाँघ काम नही कर रही थी। बहुत पीडा थी। खून के फव्वारे पेट और जाघ के घाव से छूट रहे थे। गुलमुहम्मद आगे बढ़े हुये अङ्गरेज सवार की ओर लपका। परन्तु अङ्गरेज सवार ने गुलमुहम्मद के आ पहुँचने के' पहले ही तलवार का वार रानी के सिर पर किया। वह उनकी दाई ओर पड़ा। सिर का वह हिस्सा कट गया और दाईं आंख बाहर निकल पड़ी। इसपर भी उन्होने अपने घातक पर तलवार चलाई और उसका कधा काट दिया। गुलमुहम्मद ने उस सवार के ऊपर कसकर भरपूर हाथ छोड़ा। उसके दो टुकड़े हो गये। बाकी दो तीन अंगरेज सवार बचे थे। उनपर गुलमुहम्मद बिजली की तरह टूटा। उसने एक को घायल कर दिया। दूसरे के घोड़े को लगभग अधमरा। वे तीनो मैदान छोड़कर भाग गये। अब वहा कोई शत्रु न था। जब गुलमुहम्मद मुड़ा तो उसने देखा—रामचन्द्र देशमुख घोड़े से गिरती हुई रानी को साधे हुये है। दिन भर के थके मांदे, भूखे-प्यासे, धूल और खून में सने हुये गुलमुहम्मद ने पश्चिम की ओर मुँह फेर कर कहा, 'खुदा, पाक परवर- दिगार, रहम, रहम !' । उस कट्टर सिपाही की आँखे आसुओ को मानो बरसाने लगी और ह बच्चो की तरह हिलक हिलक कर रोने लगा। रघुनाथसिंह और देशमुख ने रानी को घोड़े पर से संभाल कर उतारा 'वेश में आकर उस अडियल घोड़े को एक लात मारी। वह अपने ॠवल की दिशा में भाग गया।

४६० झाँसी की रानी रघुनाथसिंह ने देशमुख से कहा, 'एक क्षण का भी विलम्ब नही होना चाहिये। अपने घोडे पर इनको होशियारी के साथ रक्खो और बाबा गङ्गादास की कुटी पर चलो। सूर्यास्त हुआ ही चाहता है।' देशमुख का गला रुँधा हुआ था। बालक दामोदरराव अपनी माता के लिये चुपचाप रो रहा था। रामचन्द्र ने पुचकार कर कहा, 'इनकी दवा करेगे, अच्छी हो जायेगी, रोओ मत।' रामचन्द्र ने रघुनाथसिंह की सहायता से रानी को सँभालकर अपने घोडे पर रक्खा। रघुनाथसिंह ने गुलमुहम्मद से कहा, कुँवर साहब, इस कमज़ोरी से काम और बिगडेगा। याद करिये, अपने मालिक ने क्या कहा था। अङ्गरेज अब भी मारते काटते दौड धूप कर रहे हैं। यदि आ गये तो रानी साहब की देह का क्या होगा? गुलमुहम्मद चौक पडा। साफे के छोर से आँसू पोछे। गला बिलकुल सूख गया था। आगे बढने का इशारा किया। वे सब द्रुतगति से बाबा गङ्गादास की कुटी पर पहुँचे।

लक्ष्मीबाई ४६१ [ ६१ ] विसूरते हुये दामोदरराव को एक ओर बिठला कर रामचन्द्रराव ने अपनी वर्दी पर रानी को लिटा दिया और बचे हुये साफे के टुकडे प उनके सिर के घाव को बाधा । रघुनाथसिंह ने अपनी वर्दी पर मुन्दर के शव को रख दिया । गुलमुहम्मद ने घोडे को जरा दूर पेडो से जा अटकाया । बाबा गंगादास ने पहिचान लिया । बोले, 'सीता और सावित्री के देश की लडकिया हैं ये ।' रानी ने पानी के लिये मुँह खोला । बाबा गंगादास तुरन्त गंगाजल ले आये । रानी को पिलाया । उनको कुछ चेत आया । मुँह से पीडित स्वर मे धीरे से निकला, 'हर हर महादेव ।' उनका चेहरा कष्ट के मारे बिलकुल पीला पड गया । अचेत हो गई । बाबा गंगादास ने पश्चिम की ओर देखकर कहा, 'अभी कुछ प्रकाश है । परन्तु अधिक विलम्ब नही । थोडी दूर घास की एक गञ्जी लगी हुई है । उसी पर चिता बनाओ । मुन्दर की ओर देखकर बोले, 'यह इस कुटी में रानी लक्ष्मीबाई के साथ कई बार आई थी । इसका तो प्राणान्त हो गया है ।' रघुनाथसिंह के रुद्ध कण्ड से केवल 'जी' निकला । उसके मुँह में भी बाबा ने गंगाजल की कुछ बूँदें डाली । रानी फिर थोडे से चेत में आईं कम से कम रघुनाथसिंह इत्यादि को यही जान पडा । दामोदरराव पास आ गया । उसको अवगत हुआ कि मा बच गई और फिर खड़ी हो जायगी । उत्सुकता के साथ उनकी ओर टकटकी लगाई । रानी के मुँह से बहुत टूटे स्वर में निकला, 'ओ३म् वासुदेवाय नम इसके उपरान्त उनके मुँह से जो कुछ निकला वह अस्पष्ट था । होठ हिल रहे थे । वे लोग कान लगाकर सुनने लगे । उनकी समझ में केवल तीन टूटे शब्द आये • '

४६२ झांसी की रानी । ॰ ॰ द ॰ ह ॰ ति ॰॰॰ नै ॰॰ य ॰॰॰ पावक.'मुख मडल प्रदीप्त हो गया । – सूर्यास्त हुआ । प्रकाश का अरुण पुञ्ज दिशा की भाल पर था । उसकी अगणित रेखाये गगन में फैली हुई थी । देशमुख ने बिलख कर कहा, 'झासी का सूर्य अस्त हो गया ।' रघुनाथसिंह बिलख बिलख कर रोने लगा । दामोदरराव ने चीत्कार किया । बाबा गगादास ने कहा, 'प्रकाश अनन्त है । वह कण कण को भासमान कर रहा है । फिर उदय होगा । फिर प्रत्येक कण मुखरित हो उठेगा ।'

लक्ष्मीबाई ४६३ [ ६२ ] बाबा गंगादास ने सचेत किया, 'झाँसी की रानी के सिधार जाने को अस्त होना कहते हो ! यह तुम्हारा मोह है । वह अस्त नही हुई । वह अमर हो गईं । कायरता का त्याग करो । उस घास की गञ्जी पर इन दोनो देवियो के शवो का दाह सस्कार करो अंग्रेज़ इन लोगो की खोज में आते होगे । शीघ्रता करो ।' वे दोनो संभले । देशमुख ने कहा, 'घास की गञ्जी बडी है ?' बाबा गंगादास ने उत्तर दिया, 'गञ्जी तो छोटी सी है ।' देशमुख कष्टपूर्ण स्वर में बोला, 'झाँसी की रानी के दाह के लिये आज लकडी भी सुलभ नही ! घास की अग्नि तो इन दो शवो को केवल झोस देगी । सवेरे शत्रु इनके अर्धदग्ध शरीर देखेगे, हँसेगे और शायद कही फेक देंगे ।' बाबा ने सिर उठाकर अपनी कुटिया को देखा । बोले, 'इस कुटिया में काफी लकड़ी है । उधेड़ डालो । अन्त्येष्टि का आरम्भ करो ।' रघुनाथसिंह ने प्रार्थना की, आपकी कुटी की लकडी ! आप एक कृपा करें तो ।' बाबा ने पूछा, 'क्या ?' रघुनाथसिंह ने उत्तर दिया, 'फिर से कुटी बनाने में आपको असुविधा होगी, इसलिये कुछ भेट ग्रहण करली जावे ।' बाबा मुस्कराये । बोले, 'यह लकडी मेरी नही है । जिन्होने पहले दी थी वे फिर दे, देंगे । देर मत करो । कुटिया को उधेड़ो ।' देशमुख ने कहा, 'उसमें का सामान बाहर निकाल लिया जाय ।' बाबा भीतर से एक कम्बल, तूंबी, चटाई और लगोटी उठालाये ।

४६४ झाँसी की रानी बोले, 'बस और कुछ नही है। जल्दी करो।' दोनो शवो को बाहर रखकर, दामोदरराव को एक ओर बिठलाया और वे तीनो सिपाही कुटी को उधेड़ने में लग गये। बात की बात में कुटी को तोडकर लकडी इकट्ठी करली । गन्जी की कुछ घास घोडो को डाल दी और कुछ से चिता का काम लिया। रानी का कठा उतार कर दामोदरराव के पास रख दिया।, मोतियो की एक छोटी कठी उनके गले में रहने दी। उनका कवच और तवे भी। चिता पर देशमुख ने रख दिया और अग्नि संस्कार कर दिया। अपनी और रघुनाथसिंह की वर्दिया भी चिता पर रखदी। आधी घड़ी में चिता प्रज्वलित हो गई। उस कुटी की भूमि पर रक्त वह गया था। उसको देशमुख ने धो डाला। परन्तु उन रक्त की बूंदो ने पृथ्वी पर जो इतिहास लिख दिया था वह अमिट रहा।

लक्ष्मीबाई ४६५ [ ९३ ] कुछ दूरी पर रिसाले की टापो का शब्द सुनाई पडा । वह रिसाला अग्रेज़ो का था । देशमुख—'रानी साहव की तलाश में बैरी घूम रहे हैं।' रघुनाथसिंह—'आप दामोदरराव को लेकर तुरन्त निकल जाइये।' देशमुख—'आप दीवान साहब क्या झाँसी की ओर जायेगे ?' रघुनाथसिंह--'झांसी में मेरा अब क्या रक्खा है। मै इन सवारो को मार कर मरूँगा। ये लोग चिता की ओर आयेंगे। इसे उसेलेंगे। जाइये तुरन्त जाइये। रात को कही छिप जाना . विश्राम करना।' देशमुख---'कठे का क्या होगा ?' रघुनाथसिंह—'मृत सिपाहियो के बाल बच्चो मे बाट देना या कुछ भी करना।' देशमुख ने दामोदरराव को पीठ पर बाधा और घोडे पर सवार होकर चल दिया। रघुनाथसिंह ने गुलमुहम्मद से कहा, 'कुँवर साहब आप भी जाइये। मेरे घोडे को छोड़ दीजिये, उस विचारे को कोई न कोई रख लेगा। आवरे में से मेरी बन्दूक और गोली वारूद का झोला लाने की कृपा करिये।' गुलमुहम्मद घोडे के पास गया। दोनो के आवरो में से गोली बारूद और बन्दूकें निकाल ली। और, दोनो घोडो को जीन सहित छोड दिया। गुलमुहम्मद ने रघुनाथसिंह को बन्दूक और गोली बारूद देते हुये कहा, 'दीवान साहब, अम कहा जायगा ? अम राहतगढ से जब चला तब पाचसौ पठान था। अब एक रह गया। अकेला कहा जायगा ? अम भी मारेगा और मरेगा। बाई, अमको मत हटाओ।' रघुनाथसिंह ने कहा, 'मै चाहता हू आप जिन्दा रहे, और इनकी पवित्र हड्डियो और भस्म को किसी गैर को न छूने दे। रहा मे सोजांने की बहुत जल्दी पड रही है। वे अभी रास्ते में होगे उनमे जल्दी मिलना है, और बन्दूकें भरने लगा।

४६६ झाँसी की रानी रघुनाथसिंह पागलो का सा हँसा । गुलमुहम्मद ने एक क्षण सोचा । बोला, 'यह फकीर साहब हड्डियों की हिफाजत करेगा ।' रघुनाथसिंह ने कहा, 'फकीर नही करेगा । आप चाहे तो कर सकते है ।' 'अच्छा,' गुलमुहम्मद बोला, 'अम जिन्दा रहेगा । खाक और हड्डियों पर चबूतरा बना देगा ।' 'अपनी बन्दूक भी मुझको देदो कु वर साहब, रघुनाथसिंह ने प्रस्ताव किया ।' गुलमुहम्मद ने प्रतिवाद किया, 'अब कुँवर साहब नही । अम फकीर बनकर रहेगा । गुलसाईं नाम होगा ।' उसने अपनी बन्दूक दे दी । 'इसको भर दीजिये', रघुनाथसिंह ने अनुरोध किया । 'बस बाई । अब बन्दूक या कोई हथियार नही छुयेगा अम खुदापाक की याद में बाकी जिन्दगी खतम करेगा ।' एक तरफ जाकर गुलमुहम्मद ने अपनी वर्दी जलती हुई चिता पर फेंककर खाक कर दी —केवल साफा रक्खा । उसके एक टुकड़े की लँगोटी लगाई । बाकी ओढने विछाने को रख लिया । खूब हँसकर बोला, 'अब अम बिलकुल आज़ाद हो गया बाई ।' रघुनाथसिंह ने दोनो बन्दूके भर ली । गोली बारूद के, झोले लटकाये गुलमुहम्मद के पास गया उसको देखकर विस्मित हुआ । बोला, आप तो सचमुच फकीर हो गये ! अच्छा सलाम कुँवर, साईं साहब । भूल चूक गलती माफ कीजिये ।' 'सलाम,' गुलमुहम्मद ने कहा । जिस ओर से टापो का शब्द आ रहा था रघुनाथसिंह उसी दिशा में गया । पास जाकर एक आड ली । लेट गया । प्रतीति करली कि अग्रेजो का रिसाला है और कुटी की ओर आ रहा है।

लक्ष्मीबाई ४६७ 'धाय धाय' बन्दूक चलाई । 'धाय धाय' अंग्रेजी रिसाले का जवाब आया । काफी समय तक रिसाले के सैनिको को हताहत करता रहा । फिर ? एक गोली से मारा गया । चिता 'साय-साय' जलती रही । गुलमुहम्मद चिता से कुछ दूर जाकर लेट गया । साफे के टुकडे से अपने को ढका । बेहद थका हुआ था, सो गया । सवेरे जब आँख खुली देखा कि चिता के स्थान पर कुछ जली हड्डिया बाकी रह गई हैं । उसके मुँह से निकल पडा, 'ओफ रानी साहब का सिर्फ यह हड्डी रह गया है ! और उस हसीन लडकी का !' फिर तुरन्त उसने अपने मन में कहा, 'ओ कबी नही । वो मरा नहीं । वो कबी नई मरेगा । वो मुर्दों को जान बख्शता रहेगा ।' चिता के ठडे हो जाने पर गुलमुहम्मद ने उस स्थान पर एक चबूतरा बाधा और कही से फूल लाकर उस पर चढाये । अंग्रेजी सेना का एक दल रानी की ढूँढ खोज में वहाँ पर आया । चबूतरा अभी सूखा न था । उस दल के अगुआ का कुतूहल जागा । गुलमुहम्मद से उसने पूछा, ' यह किसका मज़ार है साई साहब ?' गुलमुहम्मद ने उत्तर दिया, 'अमारे पीर का, वो बोत बड़ा वली था ।'

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परिशिष्ट [ १ ] कई दिन तक अङ्गरेज़ो को रानी के शरीरान्त का पता न लगा । जब लगा तब जनरल रोज़ ने कहा था, 'यह थी उनमें सर्वश्रेष्ठ और सर्वोत्कृष्ट वीर । * अठारह जून के सूर्यास्त के पहिले ही रावसहाब के मोर्चे छीन लिये गये थे। थोडी देर तक तात्या ने बिगडे को बनाने का अथक परिश्रम किया, परन्तु अन्त में दोनो को रणक्षेत्र छोडना पडा । रावसाहब छिपते भटकते चार वर्ष बाद साधु वेश में पकडा गया और उसको बिठूर में फांसी दी गई। उसके सम्पूर्ण जीवन में उसका परिणाम ही महान् था, और अङ्गरेजो की प्रति हिंसा की विराटता थी उसको बिठूर में ले जाकर फासी पर चढाया। तात्या ने निस्सन्देह कभी हार नही मानी। वह लक्ष्मीबाई के ऊँचे राजनैतिक आदर्श तथा रणपांडित्य का सच्चा अनुयोगी और उत्तराधिकारी था। जब अङ्गरेजो ने १८५८ के अन्त तक सारे हिन्दुस्तान को अपने फोजी शिकञ्जे में जकड लिया, तब भी तात्या आधी और बिजली की तरह तडपता और तडकता रहा और अङ्गरेजो को भूल भुलैया खिलाता रहा। तात्या को आशा थी कि इतना सब खोजाने पर भी मैं देश को जगा दूँ गा और खडा कर लूँगा, परन्तु जैसे कि इस अभागे देश में होता चला आया था, राजपूताने के एक उसके मित्र राजा ने विश्वासघात करके पकड़वा दिया। तात्या को शिवपुरी में अप्रैल सन् १८५६ में, फासी दी गई। तात्या का मरण उसके जीवन से भी बढकर ज्वलन्त था। फांसी पर चढने के समय वह योगियो की तरह शान्त था। उसने कहा था, She was the best & the bravest of them all.

५०० झांसी की रानी मैंने जो कुछ किया अपने स्वामी पेशवा की आज्ञा से किया, और कुछ बुरा नही किया।' नाना साहब का कोई पता नही चला। पहली नवम्बर सन् १८५८ को विक्टोरिया का विख्यात घोषणा पत्र जारी किया गया। बादा के नवाब ने आत्मसमर्पण किया और उनको कुछ पैन्शन मिल गई। कम्पनी का, थोड़े से अङ्गरेज पूँजीपतियो और व्योपारियो का, राज्य समाप्त हुआ, और यह पुराना देश नये इंगलैंड के समग्र पूँजीपतियो और व्योपारियो के केन्द्रस्थ शासन के समक्ष हो गया। झांसी के हृदय में झासी की रानी का राज्य सदा बना रहा-लावनियो में, फागो में, गांवो और शहरो में किसान और मजदूर उनके सम्बन्ध में अपने निजत्व को प्रकट करते रहे हैं। उनकी एक स्मृति झासी नगर में आज भी जनता को पकड़े हुये हैं-होली जलने के बाद की प्रथमा के दिन झासी वाला होली नही मनाता, वह दिन उसके लिये सूतक का है। यदि हैदराबाद के निजाम और ग्वालियर के सिन्धिया अङ्गरेजो का पक्ष न लेते, तो अङ्गरेज १८५८ के बाद इस देश मे बिलकुल नही ठहर सकते थे। उनके उस समय चले जाने के पश्चात् यहा क्या होता यह देश के विवेक और अविवेक के लिये एक बहुत बडी समस्या होती। उसी समय से अंग्रेजों ने समझ लिया कि हिन्दुस्थानी सेना में चुने हुये लोग भर्ती किये जाने चाहिये, मारके ऊँचे पदो से उनको दूर रखना, सारे देश को निश्शस्त्र कर देना और मृग-मरीचिकाएँ दिखलाते रहना चाहिये। परन्तु राजाओ और नवाबो को हाथ में रखना सदा आवश्यक समझा गया। गोद का कानून स्वीकार किया गया। धार्मिक स्वतन्त्रता मानली गई। मानो हिन्दुस्थान को बडी गनीमत मिली। झासी की रानी, तात्या, बहादुरशाह इत्यादि के पीछे जो लोग हुये,

लक्ष्मीबाई ५०१ भारतीय आत्मा की अमरता के साथ उनका अटूट क्रम रहा है । केवल थोडो के ही नाम बतलाये जा सकते हैं .... । 'परमहंस रामकृष्णं, स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द, महात्मा...और, और...... ( २ ) झासी में जनेऊ का आन्दोलन घोर रूप पकडता, परन्तु बिठूर के मिहमानो का लिहाज कर के राजा गङ्गाधरराव थोडे नरम पड गये थे । तमेरो ने जनेऊ पहिने थे और वे अपने जनेऊ की आन पर मिटने को तैयार थे । उपन्यास में जाति का नाम नही दिया गया । ( ३ ) पजनेश ने जिस स्त्री को प्रेम से वशीभूत होकर रख लिया था, उसकी जात उन्होने अपनी कविता में लिख दी थी । उनका छन्द कवि की स्वच्छन्दता और उस समय की अवस्था का द्योतक है । पूरा छन्द इस प्रकार है — सिवि चूके सची से अप्सरा से इन्द्र चूके कृष्ण चूके कुब्जा सें सुरत न सभारी है । वडे वडे देव और दानव से चूक जात तुमहू न चूको तो सकल का तुम्हारी है ? भनपजनेस एक खत्रानी से हमहु चूके चूक जात जग में बिना सक नरनारी है । कोमल तन ललित नैन वसत निसि वासर मन प्यारी हमारी की लाज गङ्ग धारी है । ( ४ ) हृदयेश ने अपनी कविता जितनी लिख पाई थी वह पूरी की पूरी नीचे दी जाती है । मेरे पास हृदयेश की कविता उन्ही के हाथ की लिखी है, जो मुझको भाई श्री भगवानदास सेठ की कृपा से प्राप्त हुई —

५०३ झांसी की रानी बडे बडे असराफ गरद कर ऐसौ कलजुग आला विभचारिन बिस्वन के उर में वर मुक्तन की माला भन हृदेश पण्डित गुनमण्डित ते धारे मृगछाला गानतान वारे धनवारे ओढे फिरे दुसाला ।१। महाबीर वीरन के बेटा बैठे गहे किनाला खसिया भँडुआ राड मिलावे बाधे फिरे तिपाला कीमखाब के पैरन वारे भोगे अन्न कसाला घोडिन की खिजमित कर तिनके परे कानमें बाला ।२। पतिव्रता लरकन को तरसे बिभचारिन घर लाला झूठे के मुख लाली देखी साचे के मुख काला सत्य बचन परमान चलन को परे दुष्ट के जाला चुगलखोर धानचोर मसखरा परे सेज सुखसाला ।३। देवमदिरिन दिया न बाती गोरन पै उजियाला भूमदेव विप्रन के देखो कोडी देत कसाला रडिन को भोजन को सिन्नी ऊपर पान मसाला साधुन को नहि चून चनन कौ सेवे देव दिवाला ।४। चतुर नरन को बदसूरत की कूरन के घर बाला मूरख बैठे मौज उडावे परबीनन पग छाला भूपत कृपा करत नीचन पै कर अनीति प्रतिपाला जबर जोर कलिकाल काल कौ गुन कौ चलै न चाला ।५। मुसलमान सीतापति सुमरे हिन्दू मुख हकताला मुसलमान मौसी कर टेरे हिन्दू टेरैं खाला साची कहे सुनै को बिनती भयो नीच बल वाला अधरम प्रगट भयो भूतल पै धसगो धरम पताला ।६। जगतगुरू विप्रन को निन्दत बेनिक पुत्र घर वाला मुछमुण्डन की दच्छा लै लै फेरे तुलसीमाला ।७।

लक्ष्मीबाई ५०३ मालपुआ हलुआ भोजन दै गुप्त खिलावत लाला अधरम नाम जपत सीतापत डार गोमुखी माला दीसे भक्त बडे ठाकुर के तिलक सरसरे भाला जाचत देख विप्र साधुन को होत क्रोध को जाला ।८। कासीपुरी अजुध्या मथुरा इनको जात कसाला दोम दोम कर जात मदारन दाब काख में लाला पूजत प्रेत गुरैया बाबा छोडे देव बिसाला निजपति मुच्छ तुच्छ कर जारत उपपति हित प्रतिपाला ।६। बिछिया दृगन कोर भर कारज अग आभरन जाला मुलकट कचुक कसत कुचन पै उर धारे बनमाला अधरम............ यही तक कवि ने लिख पाया । ( ५ ) नारायण शास्त्री की प्रेमका छोटी का असली नाम लोग मछरिया बतलाते हैं । उपन्यास में जितने नाम आये हैं सब वास्तविक हैं । मैने केवल मछरिया का नाम बदलकर छोटी कर दिया है । झाँसी में नारायण शास्त्री में तत्रवल को जो रूप जनपरम्परा में मिला है वह बडा संकेतपूर्ण है । कहते हैं कि एक रात नारायण शास्त्री काली का पूजन करके मास और मदिरा का सेवन करना ही चाहते थे कि राजा गंगाधरराव टोह लगाकर आ पहुचे । राजा ने पूछा, 'बोतल में क्या है ?' शास्त्री ने उत्तर दिया, 'दूध ।' 'और कटोरे में क्या है शास्त्री जी ?' 'गुलाब के फूल ।' राजा ने बोतल और कटोरे का निरीक्षण किया तो बोतल में दूध और कटोरे में गुलाब के फूल पाये । जब नव्वे वर्ष के भीतर ही जन- परम्परा ने एक वास्तविकता को यह रूप दे दिया तो अपने बडो के स्वा-

भाविक किन्तु लोकाचार विरुद्ध कृत्यो को, उसने गाथाओ मे जो रूप दे दिये हैं उनको, समझने में बहुत बाधा नही रहनी चाहिये । ( ६ ) गंगाधरराव अत्यन्त क्रोधी थे । उनके अत्याचारो की बहुत सी कहा- निया प्रसिद्ध हैं । उनके प्रति जनता की घृणा रानी लक्ष्मीबाई के नाम के कारण नरम पड गई थी और अब भी नरम है । ( ७ ) झासी मे हरदी कुंकू उत्सव महाराष्ट्रो में बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता था । झासी की साधारण जनता भी उसको मनाया करती थी । अब भी यह सुन्दर उत्सव मनाया जाता है, परन्तु उसमे अब वह ओज नही रहा । जीवन के सघर्षों और वर्तमान उदासीनता में वह घिस गया है । रानी लक्ष्मीबाई इस उत्सव को कितनी उमंग के साथ मनाती थी उसका व्योरेवार वर्णन विष्णुराव गोडशे के 'माझा प्रवास' मे है । ( ८ ) पेशवा के साथ अङ्गरेजो ने सन् १८०२ में जो सन्धि की थी उसको पारसनीस ने अपनी पुस्तक में उद्धृत किया है । ( ९ ) भग्गी दाउजू जाति के सुनार थे । वे झाँसी के गदीगर मुहल्ले में रहते थे । नत्थेखा की लडाई पर उन्होने तीन चार पृष्ठो में एक रायसा लिखा था । वह श्री नारायणदास शृङ्गीऋषि के पास है । उन्ही की कृपा से रायसा मुझको प्राप्त हुआ । मन्जु छन्द में है । प्रत्येक छन्द का चौथा चरण है— 'झासी की जो लटी तकै तिर्हि खाये कालका माई ।' भग्गी ने 'रानी की जो लटी तकै' नही लिखा है; उन्होने 'झासी' शब्द प्रयुक्त किया है और उसकी सार्थकता बहुत द्योतक है । झासी -१८५७ के विप्लव के ज़माने में जोश से उमड पडी थी । किसी जाति के लिये भी नही कहा जा सकता कि उसमें लड़ाई के लिये कम जोश था ।

लक्ष्मीबाई ५०५ यह ऐतिहासिक सत्य है कि उनाव दरवाजे पर कोरियो की तोप थी और तोपखाने का सचालक पूरन कोरी था । उसके पौत्र ने मुझको सारी घटनायें बतलाई और झलकारी के विकट और निर्भीक पराक्रम का हाल सुनाया । जनरल रोज ने अपनी डायरी में झलकारी की घटना का वर्णन नही किया है, परन्तु कोरियो में वह घटना विख्यात है—४ एप्रिल १८५८ की रात को रानी के निकल जाने पर, पाच के बडे सवेरे झलकारी घोडे पर बैठकर रोज के सामने पहुची और उससे कहा, 'रानी को कहा ढूंढते फिरते हो ? मै हूँ रानी, पकडलो मुझको ।' झलकारी बहुत उमर पाकर मरी । मुझको उसके दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त नही हो पाया । उसके मरने का पता तब लगा, जब रानी की बातो का पता लगाते लगाते मै कोरियो के सम्पर्क में आया । झाँसी में ऊँची जाति के कहलाने वाले लोग कोरियो के हाथ का पानी पीते हैं, घर तो उनके इतने स्वच्छ हैं कि जान पडता है कि अभी अभी किसी यज्ञ को समाप्त करके निबटे हो । कोई आश्चर्य नही यदि रानी ने हरदी कूं कूं के उत्सव में झलकारी को अपने अङ्क में भर लिया हो । ( १० ) अंग्रेज इतिहासकारों ने रानी के वाक्य को, जिसका उच्चार उन्होने अंग्रेजों द्वारा झासी अपहरण के समय किया था, यह रूप दिया है— 'मेरा झासी देगा नही ।' इसकी नकल बहुत से भारतीय लेखको ने की है । रानी हिन्दी और मराठी दोनो जानती थी । इतनी कुशाग्र बुद्धि थी कि झासी आकर उन्होने बुन्देलखण्डी भी सीख ली थी । उनके वाक्य का तोड मरोड एलिस ने अपने लेख में किया और भारतीय लेखको ने बिना जाने बूझे उसकी नकल करदी । १८५७ के लगभग अङ्गरेज खासी हिन्दी भाषा को बोल लेते थे, परन्तु हिन्दी भाषा को कुरूप करना उनकी राष्ट्रीय और स्वभावनिहित उपेक्षा का एक उदाहरण है वे आज भी फ्रेन्च, जर्मन और रूसी शब्दो का तोडमरोड करते हैं । यहा तक कि अमेरिका में बोली

५०६ झांसी की रानी और लिखी जाने वाली अंग्रेज़ी तक पर नाक भोह सिकोड लेते हैं । रानी के मु ह से निकले हुये हिन्दी के प्रतिवाद वाक्य को सुरक्षित रखने में एलिस या किसी भी अंग्रेज को रुचि हो ही क्यो सकती थी ? ( ११ ) रानी ने सूरमाओ की एक कुँवर मडली स्थापित की थी । वे स्त्री- पुरुषो की सूक्ष्म जांच करने की बडी क्षमता रखती थी । झांसी की रक्षा के लिये उनको ऐसे लोगो की जरूरत थी जो अपने को होम देने के लिये सदा तैयार रहते हो । जिसको उन्होने सुपात्र समझा उसको 'कुँवर' का सम्बोधन मिल जाता था रानी ने जितनो को यह उपाधि दी, उनमें से किसी ने भी अपने बलिदान में कसर नही लगाई । ( १२ ) रानी ने जो स्त्री सेना बनाई थी वह भारत का एक अचम्भा है । जनरल रोज, जनरल स्टुअर्ट, डाक्टर लो इत्यादि ने जो रानी के मुकाबले मे लडने वाली अंग्रेजी सेना में झासी आये थे दूरबीनो द्वारा इस सेना का नियम संयम, शौर्य पराक्रम, और दुश्मन का होश ठिकाने लगाने वाली दृढता को देखा था । इस सेना मे महाराष्ट्र स्त्रिया बहुत कम थी । बुन्देलखण्डी स्त्रिया ज्यादा और विविध जातियो की । यदि लक्ष्मीबाई स्वराज्य स्थापना के प्रयत्न मे सफल हो जाती तो भारत की नारी उस गिरी हालत में कदापि न होती जिसमें उसका एक अंश आज है । माझा प्रवास का लेखक विष्णुराव गोडशे जब झासी आया तब झासी की स्त्रियो की स्वाधीनता को देखकर विस्मित हो गया—उसको तो गुस्सा भी आया । स्त्रिया शान और हेकडी के साथ सन्ध्या समय मन्दिरो में जाती थी, यह बात विष्णुराव को बहुत खटकी, क्योकि उसने अन्यत्र न देखी थी । पर क्या अन्यत्र स्त्रियो की कोई वैटालियन थी ? कोई रेजीमेंट था ? उनमें से कोई कर्नल या कप्तान थी ? सवेरे परेड में मर्दों को सबक सिखलाने वाली, और घुडसवारी में मर्दों का कान पकडने वाली स्त्रिया, क्या शाम को मन्दिर जाने के समय झेंपती, शरमाती और घूंघट डालकर

लक्ष्मीबाई ५०७ नयिका भेद को प्रोत्साहन देती ? परन्तु 'माझा प्रवास' का लेखक असली बात समझा न था । मेरी दादी परदादी कहा करती थी कि रानी जिस मिट्टी के ढेले को छू देती थी वह सोना हो जाता था, जिस काठ के टुकडे को स्पर्श कर देती थी वह फौलाद बन जाता था । मुझको आश्चर्य होता था । पर बात लगती बहुत अच्छी थी । सोचता था यदि मै उस ज़माने में होता तो डलियो ढेले उनके पास ले जाता और उनसे स्पर्श करवाकर सोना बनवा लेता, फिर दादी परदादी से पैसे मागने की ज़रूरत ही न रहती । और वे काठ के टुकडो को फौलाद बना देती थी । यह उतना अच्छा नही लगता था । और आज ? आह ! उस रानी का स्पर्श तो प्राप्त नही है, पर नाम ने मिट्टी के ढेलो को स्वर्ण बना दिया और काठ के टुकड़ो को वज्र—और जब तक भारत भारत है वह नाम यह काम करता ही रहेगा । यही कारण है कि अङ्गरेज पलटन के बलवाइयो के सामने लक्ष्मीबाई महल के झरोखे पर चिनौती देती हुई अकेली खडी हो गई ! यही कारण है कि सदाशिवराव नेवालकर के झाँसी नरेश बन जाने की घोषणा पर कोई भी सीखी सिखाई सेना हाथ में न होते हुये भी लक्ष्मीबाई कुछ मिट्टी के ढेलो और काठ के टुकडो को लेकर करेरा में भिड गई और सदाशिवराव को परास्त कर दिया । यही कारण है कि लक्ष्मीबाई नत्थेखा के बीस-हज़ार सिपाहियो का मुकाबिला झाँसी के अधकचरे स्त्री पुरुष सिपाहियो को लेकर कर गई । और उसको मार भगाया ।। सागरसिंह डाकू से जनरल बना और खडेराव फाटक की रक्षा में मरकर अनन्त गौरव पागया । ( १३ ) जान रसल ने जो आवेदन पत्र दिल्ली १७१२ में भेजा था उसका अनुवाद पारसनीस की पुस्तक में है । उसका साराश मैने इस उपन्यास में दे दिया है ।

५०८ झाँसी की रानी ( १४ ) सर जान मालकम सन् १८२५ के लगभग मध्यदेश का प्रधान सेनापति और गवर्नर था । उसने एक पुस्तक Memois of Central India लिखा है । अब यह पुस्तक अप्राप्त है ! मुझको कलकत्ते की Imperial Library से उधार मिल गई थी । मालकम ने लिखा है कि वह जमाना - चाहे दूर हो, पर आवेगा अवश्य, जब हमको हिन्दुस्थानियो का देश उन्हे वापिस करना पडेगा । ( १५ ) ग्वालियर से नाटक मंडली लगभग जनवरी सन् १८५८ में आई थी । रानी यदि फौज को विकट तैयारी और पराक्रम देसकती थी तो कलाओ को प्राण देने की भी साध रखती थी । ग्वालियर से आई हुई नाटक मंडली को हरिश्चन्द्र नाटक का अभिनय करने के उपलक्ष में उन्होने चार हजार रुपया पुरस्कार में दिया था । गवैये, बीनकार, पखावजी इत्यादि सब उनका आश्रय पाये हुये थे । सुखलाल चित्रकार जाति का काछी था । उसकी चित्रकला को वे पुरस्कृत करती रहती थी '। मुखपृष्ट पर दिया गया रानी का, और गङ्गाधरराव का चित्र उसका ही बनाया है । ( १६ ) विष्णुराव गोडशे पूना की दिशा से, ग्वालियर होता हुआ आया था । वह भट्टभिक्षुक था । रानी ने जब झासी में यज्ञ किया तब वह मौजूद था और युद्ध के दिनो मे किले मे ही था । उसने उन दिनो का आखो देखा हाल अपने 'माझा प्रवास, में लिखा है, उपन्यास की कुछ घटनाएं 'माझा प्रवास' के आधार पर हैं । उनके सत्यका निर्धार किम्वदन्तियो और जनरल रोज के खरीतो से होता है । पारसनीस ने अपनी पुस्तक में बहुत सामग्री विष्णुराव की पुस्तक से ली है । परन्तु पारसनीस ने विष्णुराव की पुस्तक का कोई हवाला नही दिया है । कम से कम हिन्दी के अनुवाद में मुझको नही मिला ।