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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ५०३ मालपुआ हलुआ भोजन दै गुप्त खिलावत लाला अधरम नाम जपत सीतापत डार गोमुखी माला दीसे भक्त बडे ठाकुर के तिलक सरसरे भाला जाचत देख विप्र साधुन को होत क्रोध को जाला ।८। कासीपुरी अजुध्या मथुरा इनको जात कसाला दोम दोम कर जात मदारन दाब काख में लाला पूजत प्रेत गुरैया बाबा छोडे देव बिसाला निजपति मुच्छ तुच्छ कर जारत उपपति हित प्रतिपाला ।६। बिछिया दृगन कोर भर कारज अग आभरन जाला मुलकट कचुक कसत कुचन पै उर धारे बनमाला अधरम............ यही तक कवि ने लिख पाया । ( ५ ) नारायण शास्त्री की प्रेमका छोटी का असली नाम लोग मछरिया बतलाते हैं । उपन्यास में जितने नाम आये हैं सब वास्तविक हैं । मैने केवल मछरिया का नाम बदलकर छोटी कर दिया है । झाँसी में नारायण शास्त्री में तत्रवल को जो रूप जनपरम्परा में मिला है वह बडा संकेतपूर्ण है । कहते हैं कि एक रात नारायण शास्त्री काली का पूजन करके मास और मदिरा का सेवन करना ही चाहते थे कि राजा गंगाधरराव टोह लगाकर आ पहुचे । राजा ने पूछा, 'बोतल में क्या है ?' शास्त्री ने उत्तर दिया, 'दूध ।' 'और कटोरे में क्या है शास्त्री जी ?' 'गुलाब के फूल ।' राजा ने बोतल और कटोरे का निरीक्षण किया तो बोतल में दूध और कटोरे में गुलाब के फूल पाये । जब नव्वे वर्ष के भीतर ही जन- परम्परा ने एक वास्तविकता को यह रूप दे दिया तो अपने बडो के स्वा-