झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 517, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाविक किन्तु लोकाचार विरुद्ध कृत्यो को, उसने गाथाओ मे जो रूप दे दिये हैं उनको, समझने में बहुत बाधा नही रहनी चाहिये । ( ६ ) गंगाधरराव अत्यन्त क्रोधी थे । उनके अत्याचारो की बहुत सी कहा- निया प्रसिद्ध हैं । उनके प्रति जनता की घृणा रानी लक्ष्मीबाई के नाम के कारण नरम पड गई थी और अब भी नरम है । ( ७ ) झासी मे हरदी कुंकू उत्सव महाराष्ट्रो में बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता था । झासी की साधारण जनता भी उसको मनाया करती थी । अब भी यह सुन्दर उत्सव मनाया जाता है, परन्तु उसमे अब वह ओज नही रहा । जीवन के सघर्षों और वर्तमान उदासीनता में वह घिस गया है । रानी लक्ष्मीबाई इस उत्सव को कितनी उमंग के साथ मनाती थी उसका व्योरेवार वर्णन विष्णुराव गोडशे के 'माझा प्रवास' मे है । ( ८ ) पेशवा के साथ अङ्गरेजो ने सन् १८०२ में जो सन्धि की थी उसको पारसनीस ने अपनी पुस्तक में उद्धृत किया है । ( ९ ) भग्गी दाउजू जाति के सुनार थे । वे झाँसी के गदीगर मुहल्ले में रहते थे । नत्थेखा की लडाई पर उन्होने तीन चार पृष्ठो में एक रायसा लिखा था । वह श्री नारायणदास शृङ्गीऋषि के पास है । उन्ही की कृपा से रायसा मुझको प्राप्त हुआ । मन्जु छन्द में है । प्रत्येक छन्द का चौथा चरण है— 'झासी की जो लटी तकै तिर्हि खाये कालका माई ।' भग्गी ने 'रानी की जो लटी तकै' नही लिखा है; उन्होने 'झासी' शब्द प्रयुक्त किया है और उसकी सार्थकता बहुत द्योतक है । झासी -१८५७ के विप्लव के ज़माने में जोश से उमड पडी थी । किसी जाति के लिये भी नही कहा जा सकता कि उसमें लड़ाई के लिये कम जोश था ।