भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ५०५ यह ऐतिहासिक सत्य है कि उनाव दरवाजे पर कोरियो की तोप थी और तोपखाने का सचालक पूरन कोरी था । उसके पौत्र ने मुझको सारी घटनायें बतलाई और झलकारी के विकट और निर्भीक पराक्रम का हाल सुनाया । जनरल रोज ने अपनी डायरी में झलकारी की घटना का वर्णन नही किया है, परन्तु कोरियो में वह घटना विख्यात है—४ एप्रिल १८५८ की रात को रानी के निकल जाने पर, पाच के बडे सवेरे झलकारी घोडे पर बैठकर रोज के सामने पहुची और उससे कहा, 'रानी को कहा ढूंढते फिरते हो ? मै हूँ रानी, पकडलो मुझको ।' झलकारी बहुत उमर पाकर मरी । मुझको उसके दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त नही हो पाया । उसके मरने का पता तब लगा, जब रानी की बातो का पता लगाते लगाते मै कोरियो के सम्पर्क में आया । झाँसी में ऊँची जाति के कहलाने वाले लोग कोरियो के हाथ का पानी पीते हैं, घर तो उनके इतने स्वच्छ हैं कि जान पडता है कि अभी अभी किसी यज्ञ को समाप्त करके निबटे हो । कोई आश्चर्य नही यदि रानी ने हरदी कूं कूं के उत्सव में झलकारी को अपने अङ्क में भर लिया हो । ( १० ) अंग्रेज इतिहासकारों ने रानी के वाक्य को, जिसका उच्चार उन्होने अंग्रेजों द्वारा झासी अपहरण के समय किया था, यह रूप दिया है— 'मेरा झासी देगा नही ।' इसकी नकल बहुत से भारतीय लेखको ने की है । रानी हिन्दी और मराठी दोनो जानती थी । इतनी कुशाग्र बुद्धि थी कि झासी आकर उन्होने बुन्देलखण्डी भी सीख ली थी । उनके वाक्य का तोड मरोड एलिस ने अपने लेख में किया और भारतीय लेखको ने बिना जाने बूझे उसकी नकल करदी । १८५७ के लगभग अङ्गरेज खासी हिन्दी भाषा को बोल लेते थे, परन्तु हिन्दी भाषा को कुरूप करना उनकी राष्ट्रीय और स्वभावनिहित उपेक्षा का एक उदाहरण है वे आज भी फ्रेन्च, जर्मन और रूसी शब्दो का तोडमरोड करते हैं । यहा तक कि अमेरिका में बोली