झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०६ झांसी की रानी और लिखी जाने वाली अंग्रेज़ी तक पर नाक भोह सिकोड लेते हैं । रानी के मु ह से निकले हुये हिन्दी के प्रतिवाद वाक्य को सुरक्षित रखने में एलिस या किसी भी अंग्रेज को रुचि हो ही क्यो सकती थी ? ( ११ ) रानी ने सूरमाओ की एक कुँवर मडली स्थापित की थी । वे स्त्री- पुरुषो की सूक्ष्म जांच करने की बडी क्षमता रखती थी । झांसी की रक्षा के लिये उनको ऐसे लोगो की जरूरत थी जो अपने को होम देने के लिये सदा तैयार रहते हो । जिसको उन्होने सुपात्र समझा उसको 'कुँवर' का सम्बोधन मिल जाता था रानी ने जितनो को यह उपाधि दी, उनमें से किसी ने भी अपने बलिदान में कसर नही लगाई । ( १२ ) रानी ने जो स्त्री सेना बनाई थी वह भारत का एक अचम्भा है । जनरल रोज, जनरल स्टुअर्ट, डाक्टर लो इत्यादि ने जो रानी के मुकाबले मे लडने वाली अंग्रेजी सेना में झासी आये थे दूरबीनो द्वारा इस सेना का नियम संयम, शौर्य पराक्रम, और दुश्मन का होश ठिकाने लगाने वाली दृढता को देखा था । इस सेना मे महाराष्ट्र स्त्रिया बहुत कम थी । बुन्देलखण्डी स्त्रिया ज्यादा और विविध जातियो की । यदि लक्ष्मीबाई स्वराज्य स्थापना के प्रयत्न मे सफल हो जाती तो भारत की नारी उस गिरी हालत में कदापि न होती जिसमें उसका एक अंश आज है । माझा प्रवास का लेखक विष्णुराव गोडशे जब झासी आया तब झासी की स्त्रियो की स्वाधीनता को देखकर विस्मित हो गया—उसको तो गुस्सा भी आया । स्त्रिया शान और हेकडी के साथ सन्ध्या समय मन्दिरो में जाती थी, यह बात विष्णुराव को बहुत खटकी, क्योकि उसने अन्यत्र न देखी थी । पर क्या अन्यत्र स्त्रियो की कोई वैटालियन थी ? कोई रेजीमेंट था ? उनमें से कोई कर्नल या कप्तान थी ? सवेरे परेड में मर्दों को सबक सिखलाने वाली, और घुडसवारी में मर्दों का कान पकडने वाली स्त्रिया, क्या शाम को मन्दिर जाने के समय झेंपती, शरमाती और घूंघट डालकर