भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ५०७ नयिका भेद को प्रोत्साहन देती ? परन्तु 'माझा प्रवास' का लेखक असली बात समझा न था । मेरी दादी परदादी कहा करती थी कि रानी जिस मिट्टी के ढेले को छू देती थी वह सोना हो जाता था, जिस काठ के टुकडे को स्पर्श कर देती थी वह फौलाद बन जाता था । मुझको आश्चर्य होता था । पर बात लगती बहुत अच्छी थी । सोचता था यदि मै उस ज़माने में होता तो डलियो ढेले उनके पास ले जाता और उनसे स्पर्श करवाकर सोना बनवा लेता, फिर दादी परदादी से पैसे मागने की ज़रूरत ही न रहती । और वे काठ के टुकडो को फौलाद बना देती थी । यह उतना अच्छा नही लगता था । और आज ? आह ! उस रानी का स्पर्श तो प्राप्त नही है, पर नाम ने मिट्टी के ढेलो को स्वर्ण बना दिया और काठ के टुकड़ो को वज्र—और जब तक भारत भारत है वह नाम यह काम करता ही रहेगा । यही कारण है कि अङ्गरेज पलटन के बलवाइयो के सामने लक्ष्मीबाई महल के झरोखे पर चिनौती देती हुई अकेली खडी हो गई ! यही कारण है कि सदाशिवराव नेवालकर के झाँसी नरेश बन जाने की घोषणा पर कोई भी सीखी सिखाई सेना हाथ में न होते हुये भी लक्ष्मीबाई कुछ मिट्टी के ढेलो और काठ के टुकडो को लेकर करेरा में भिड गई और सदाशिवराव को परास्त कर दिया । यही कारण है कि लक्ष्मीबाई नत्थेखा के बीस-हज़ार सिपाहियो का मुकाबिला झाँसी के अधकचरे स्त्री पुरुष सिपाहियो को लेकर कर गई । और उसको मार भगाया ।। सागरसिंह डाकू से जनरल बना और खडेराव फाटक की रक्षा में मरकर अनन्त गौरव पागया । ( १३ ) जान रसल ने जो आवेदन पत्र दिल्ली १७१२ में भेजा था उसका अनुवाद पारसनीस की पुस्तक में है । उसका साराश मैने इस उपन्यास में दे दिया है ।