झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०८ झाँसी की रानी ( १४ ) सर जान मालकम सन् १८२५ के लगभग मध्यदेश का प्रधान सेनापति और गवर्नर था । उसने एक पुस्तक Memois of Central India लिखा है । अब यह पुस्तक अप्राप्त है ! मुझको कलकत्ते की Imperial Library से उधार मिल गई थी । मालकम ने लिखा है कि वह जमाना - चाहे दूर हो, पर आवेगा अवश्य, जब हमको हिन्दुस्थानियो का देश उन्हे वापिस करना पडेगा । ( १५ ) ग्वालियर से नाटक मंडली लगभग जनवरी सन् १८५८ में आई थी । रानी यदि फौज को विकट तैयारी और पराक्रम देसकती थी तो कलाओ को प्राण देने की भी साध रखती थी । ग्वालियर से आई हुई नाटक मंडली को हरिश्चन्द्र नाटक का अभिनय करने के उपलक्ष में उन्होने चार हजार रुपया पुरस्कार में दिया था । गवैये, बीनकार, पखावजी इत्यादि सब उनका आश्रय पाये हुये थे । सुखलाल चित्रकार जाति का काछी था । उसकी चित्रकला को वे पुरस्कृत करती रहती थी '। मुखपृष्ट पर दिया गया रानी का, और गङ्गाधरराव का चित्र उसका ही बनाया है । ( १६ ) विष्णुराव गोडशे पूना की दिशा से, ग्वालियर होता हुआ आया था । वह भट्टभिक्षुक था । रानी ने जब झासी में यज्ञ किया तब वह मौजूद था और युद्ध के दिनो मे किले मे ही था । उसने उन दिनो का आखो देखा हाल अपने 'माझा प्रवास, में लिखा है, उपन्यास की कुछ घटनाएं 'माझा प्रवास' के आधार पर हैं । उनके सत्यका निर्धार किम्वदन्तियो और जनरल रोज के खरीतो से होता है । पारसनीस ने अपनी पुस्तक में बहुत सामग्री विष्णुराव की पुस्तक से ली है । परन्तु पारसनीस ने विष्णुराव की पुस्तक का कोई हवाला नही दिया है । कम से कम हिन्दी के अनुवाद में मुझको नही मिला ।