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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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५०० झांसी की रानी मैंने जो कुछ किया अपने स्वामी पेशवा की आज्ञा से किया, और कुछ बुरा नही किया।' नाना साहब का कोई पता नही चला। पहली नवम्बर सन् १८५८ को विक्टोरिया का विख्यात घोषणा पत्र जारी किया गया। बादा के नवाब ने आत्मसमर्पण किया और उनको कुछ पैन्शन मिल गई। कम्पनी का, थोड़े से अङ्गरेज पूँजीपतियो और व्योपारियो का, राज्य समाप्त हुआ, और यह पुराना देश नये इंगलैंड के समग्र पूँजीपतियो और व्योपारियो के केन्द्रस्थ शासन के समक्ष हो गया। झांसी के हृदय में झासी की रानी का राज्य सदा बना रहा-लावनियो में, फागो में, गांवो और शहरो में किसान और मजदूर उनके सम्बन्ध में अपने निजत्व को प्रकट करते रहे हैं। उनकी एक स्मृति झासी नगर में आज भी जनता को पकड़े हुये हैं-होली जलने के बाद की प्रथमा के दिन झासी वाला होली नही मनाता, वह दिन उसके लिये सूतक का है। यदि हैदराबाद के निजाम और ग्वालियर के सिन्धिया अङ्गरेजो का पक्ष न लेते, तो अङ्गरेज १८५८ के बाद इस देश मे बिलकुल नही ठहर सकते थे। उनके उस समय चले जाने के पश्चात् यहा क्या होता यह देश के विवेक और अविवेक के लिये एक बहुत बडी समस्या होती। उसी समय से अंग्रेजों ने समझ लिया कि हिन्दुस्थानी सेना में चुने हुये लोग भर्ती किये जाने चाहिये, मारके ऊँचे पदो से उनको दूर रखना, सारे देश को निश्शस्त्र कर देना और मृग-मरीचिकाएँ दिखलाते रहना चाहिये। परन्तु राजाओ और नवाबो को हाथ में रखना सदा आवश्यक समझा गया। गोद का कानून स्वीकार किया गया। धार्मिक स्वतन्त्रता मानली गई। मानो हिन्दुस्थान को बडी गनीमत मिली। झासी की रानी, तात्या, बहादुरशाह इत्यादि के पीछे जो लोग हुये,