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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ५०१ भारतीय आत्मा की अमरता के साथ उनका अटूट क्रम रहा है । केवल थोडो के ही नाम बतलाये जा सकते हैं .... । 'परमहंस रामकृष्णं, स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द, महात्मा...और, और...... ( २ ) झासी में जनेऊ का आन्दोलन घोर रूप पकडता, परन्तु बिठूर के मिहमानो का लिहाज कर के राजा गङ्गाधरराव थोडे नरम पड गये थे । तमेरो ने जनेऊ पहिने थे और वे अपने जनेऊ की आन पर मिटने को तैयार थे । उपन्यास में जाति का नाम नही दिया गया । ( ३ ) पजनेश ने जिस स्त्री को प्रेम से वशीभूत होकर रख लिया था, उसकी जात उन्होने अपनी कविता में लिख दी थी । उनका छन्द कवि की स्वच्छन्दता और उस समय की अवस्था का द्योतक है । पूरा छन्द इस प्रकार है — सिवि चूके सची से अप्सरा से इन्द्र चूके कृष्ण चूके कुब्जा सें सुरत न सभारी है । वडे वडे देव और दानव से चूक जात तुमहू न चूको तो सकल का तुम्हारी है ? भनपजनेस एक खत्रानी से हमहु चूके चूक जात जग में बिना सक नरनारी है । कोमल तन ललित नैन वसत निसि वासर मन प्यारी हमारी की लाज गङ्ग धारी है । ( ४ ) हृदयेश ने अपनी कविता जितनी लिख पाई थी वह पूरी की पूरी नीचे दी जाती है । मेरे पास हृदयेश की कविता उन्ही के हाथ की लिखी है, जो मुझको भाई श्री भगवानदास सेठ की कृपा से प्राप्त हुई —