झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 514, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ५०१ भारतीय आत्मा की अमरता के साथ उनका अटूट क्रम रहा है । केवल थोडो के ही नाम बतलाये जा सकते हैं .... । 'परमहंस रामकृष्णं, स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द, महात्मा...और, और...... ( २ ) झासी में जनेऊ का आन्दोलन घोर रूप पकडता, परन्तु बिठूर के मिहमानो का लिहाज कर के राजा गङ्गाधरराव थोडे नरम पड गये थे । तमेरो ने जनेऊ पहिने थे और वे अपने जनेऊ की आन पर मिटने को तैयार थे । उपन्यास में जाति का नाम नही दिया गया । ( ३ ) पजनेश ने जिस स्त्री को प्रेम से वशीभूत होकर रख लिया था, उसकी जात उन्होने अपनी कविता में लिख दी थी । उनका छन्द कवि की स्वच्छन्दता और उस समय की अवस्था का द्योतक है । पूरा छन्द इस प्रकार है — सिवि चूके सची से अप्सरा से इन्द्र चूके कृष्ण चूके कुब्जा सें सुरत न सभारी है । वडे वडे देव और दानव से चूक जात तुमहू न चूको तो सकल का तुम्हारी है ? भनपजनेस एक खत्रानी से हमहु चूके चूक जात जग में बिना सक नरनारी है । कोमल तन ललित नैन वसत निसि वासर मन प्यारी हमारी की लाज गङ्ग धारी है । ( ४ ) हृदयेश ने अपनी कविता जितनी लिख पाई थी वह पूरी की पूरी नीचे दी जाती है । मेरे पास हृदयेश की कविता उन्ही के हाथ की लिखी है, जो मुझको भाई श्री भगवानदास सेठ की कृपा से प्राप्त हुई —