झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट [ १ ] कई दिन तक अङ्गरेज़ो को रानी के शरीरान्त का पता न लगा । जब लगा तब जनरल रोज़ ने कहा था, 'यह थी उनमें सर्वश्रेष्ठ और सर्वोत्कृष्ट वीर । * अठारह जून के सूर्यास्त के पहिले ही रावसहाब के मोर्चे छीन लिये गये थे। थोडी देर तक तात्या ने बिगडे को बनाने का अथक परिश्रम किया, परन्तु अन्त में दोनो को रणक्षेत्र छोडना पडा । रावसाहब छिपते भटकते चार वर्ष बाद साधु वेश में पकडा गया और उसको बिठूर में फांसी दी गई। उसके सम्पूर्ण जीवन में उसका परिणाम ही महान् था, और अङ्गरेजो की प्रति हिंसा की विराटता थी उसको बिठूर में ले जाकर फासी पर चढाया। तात्या ने निस्सन्देह कभी हार नही मानी। वह लक्ष्मीबाई के ऊँचे राजनैतिक आदर्श तथा रणपांडित्य का सच्चा अनुयोगी और उत्तराधिकारी था। जब अङ्गरेजो ने १८५८ के अन्त तक सारे हिन्दुस्तान को अपने फोजी शिकञ्जे में जकड लिया, तब भी तात्या आधी और बिजली की तरह तडपता और तडकता रहा और अङ्गरेजो को भूल भुलैया खिलाता रहा। तात्या को आशा थी कि इतना सब खोजाने पर भी मैं देश को जगा दूँ गा और खडा कर लूँगा, परन्तु जैसे कि इस अभागे देश में होता चला आया था, राजपूताने के एक उसके मित्र राजा ने विश्वासघात करके पकड़वा दिया। तात्या को शिवपुरी में अप्रैल सन् १८५६ में, फासी दी गई। तात्या का मरण उसके जीवन से भी बढकर ज्वलन्त था। फांसी पर चढने के समय वह योगियो की तरह शान्त था। उसने कहा था, She was the best & the bravest of them all.