झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
परिशिष्ट [ १ ] कई दिन तक अङ्गरेज़ो को रानी के शरीरान्त का पता न लगा । जब लगा तब जनरल रोज़ ने कहा था, 'यह थी उनमें सर्वश्रेष्ठ और सर्वोत्कृष्ट वीर । * अठारह जून के सूर्यास्त के पहिले ही रावसहाब के मोर्चे छीन लिये गये थे। थोडी देर तक तात्या ने बिगडे को बनाने का अथक परिश्रम किया, परन्तु अन्त में दोनो को रणक्षेत्र छोडना पडा । रावसाहब छिपते भटकते चार वर्ष बाद साधु वेश में पकडा गया और उसको बिठूर में फांसी दी गई। उसके सम्पूर्ण जीवन में उसका परिणाम ही महान् था, और अङ्गरेजो की प्रति हिंसा की विराटता थी उसको बिठूर में ले जाकर फासी पर चढाया। तात्या ने निस्सन्देह कभी हार नही मानी। वह लक्ष्मीबाई के ऊँचे राजनैतिक आदर्श तथा रणपांडित्य का सच्चा अनुयोगी और उत्तराधिकारी था। जब अङ्गरेजो ने १८५८ के अन्त तक सारे हिन्दुस्तान को अपने फोजी शिकञ्जे में जकड लिया, तब भी तात्या आधी और बिजली की तरह तडपता और तडकता रहा और अङ्गरेजो को भूल भुलैया खिलाता रहा। तात्या को आशा थी कि इतना सब खोजाने पर भी मैं देश को जगा दूँ गा और खडा कर लूँगा, परन्तु जैसे कि इस अभागे देश में होता चला आया था, राजपूताने के एक उसके मित्र राजा ने विश्वासघात करके पकड़वा दिया। तात्या को शिवपुरी में अप्रैल सन् १८५६ में, फासी दी गई। तात्या का मरण उसके जीवन से भी बढकर ज्वलन्त था। फांसी पर चढने के समय वह योगियो की तरह शान्त था। उसने कहा था, She was the best & the bravest of them all.
५०० झांसी की रानी मैंने जो कुछ किया अपने स्वामी पेशवा की आज्ञा से किया, और कुछ बुरा नही किया।' नाना साहब का कोई पता नही चला। पहली नवम्बर सन् १८५८ को विक्टोरिया का विख्यात घोषणा पत्र जारी किया गया। बादा के नवाब ने आत्मसमर्पण किया और उनको कुछ पैन्शन मिल गई। कम्पनी का, थोड़े से अङ्गरेज पूँजीपतियो और व्योपारियो का, राज्य समाप्त हुआ, और यह पुराना देश नये इंगलैंड के समग्र पूँजीपतियो और व्योपारियो के केन्द्रस्थ शासन के समक्ष हो गया। झांसी के हृदय में झासी की रानी का राज्य सदा बना रहा-लावनियो में, फागो में, गांवो और शहरो में किसान और मजदूर उनके सम्बन्ध में अपने निजत्व को प्रकट करते रहे हैं। उनकी एक स्मृति झासी नगर में आज भी जनता को पकड़े हुये हैं-होली जलने के बाद की प्रथमा के दिन झासी वाला होली नही मनाता, वह दिन उसके लिये सूतक का है। यदि हैदराबाद के निजाम और ग्वालियर के सिन्धिया अङ्गरेजो का पक्ष न लेते, तो अङ्गरेज १८५८ के बाद इस देश मे बिलकुल नही ठहर सकते थे। उनके उस समय चले जाने के पश्चात् यहा क्या होता यह देश के विवेक और अविवेक के लिये एक बहुत बडी समस्या होती। उसी समय से अंग्रेजों ने समझ लिया कि हिन्दुस्थानी सेना में चुने हुये लोग भर्ती किये जाने चाहिये, मारके ऊँचे पदो से उनको दूर रखना, सारे देश को निश्शस्त्र कर देना और मृग-मरीचिकाएँ दिखलाते रहना चाहिये। परन्तु राजाओ और नवाबो को हाथ में रखना सदा आवश्यक समझा गया। गोद का कानून स्वीकार किया गया। धार्मिक स्वतन्त्रता मानली गई। मानो हिन्दुस्थान को बडी गनीमत मिली। झासी की रानी, तात्या, बहादुरशाह इत्यादि के पीछे जो लोग हुये,
लक्ष्मीबाई ५०१ भारतीय आत्मा की अमरता के साथ उनका अटूट क्रम रहा है । केवल थोडो के ही नाम बतलाये जा सकते हैं .... । 'परमहंस रामकृष्णं, स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द, महात्मा...और, और...... ( २ ) झासी में जनेऊ का आन्दोलन घोर रूप पकडता, परन्तु बिठूर के मिहमानो का लिहाज कर के राजा गङ्गाधरराव थोडे नरम पड गये थे । तमेरो ने जनेऊ पहिने थे और वे अपने जनेऊ की आन पर मिटने को तैयार थे । उपन्यास में जाति का नाम नही दिया गया । ( ३ ) पजनेश ने जिस स्त्री को प्रेम से वशीभूत होकर रख लिया था, उसकी जात उन्होने अपनी कविता में लिख दी थी । उनका छन्द कवि की स्वच्छन्दता और उस समय की अवस्था का द्योतक है । पूरा छन्द इस प्रकार है — सिवि चूके सची से अप्सरा से इन्द्र चूके कृष्ण चूके कुब्जा सें सुरत न सभारी है । वडे वडे देव और दानव से चूक जात तुमहू न चूको तो सकल का तुम्हारी है ? भनपजनेस एक खत्रानी से हमहु चूके चूक जात जग में बिना सक नरनारी है । कोमल तन ललित नैन वसत निसि वासर मन प्यारी हमारी की लाज गङ्ग धारी है । ( ४ ) हृदयेश ने अपनी कविता जितनी लिख पाई थी वह पूरी की पूरी नीचे दी जाती है । मेरे पास हृदयेश की कविता उन्ही के हाथ की लिखी है, जो मुझको भाई श्री भगवानदास सेठ की कृपा से प्राप्त हुई —
५०३ झांसी की रानी बडे बडे असराफ गरद कर ऐसौ कलजुग आला विभचारिन बिस्वन के उर में वर मुक्तन की माला भन हृदेश पण्डित गुनमण्डित ते धारे मृगछाला गानतान वारे धनवारे ओढे फिरे दुसाला ।१। महाबीर वीरन के बेटा बैठे गहे किनाला खसिया भँडुआ राड मिलावे बाधे फिरे तिपाला कीमखाब के पैरन वारे भोगे अन्न कसाला घोडिन की खिजमित कर तिनके परे कानमें बाला ।२। पतिव्रता लरकन को तरसे बिभचारिन घर लाला झूठे के मुख लाली देखी साचे के मुख काला सत्य बचन परमान चलन को परे दुष्ट के जाला चुगलखोर धानचोर मसखरा परे सेज सुखसाला ।३। देवमदिरिन दिया न बाती गोरन पै उजियाला भूमदेव विप्रन के देखो कोडी देत कसाला रडिन को भोजन को सिन्नी ऊपर पान मसाला साधुन को नहि चून चनन कौ सेवे देव दिवाला ।४। चतुर नरन को बदसूरत की कूरन के घर बाला मूरख बैठे मौज उडावे परबीनन पग छाला भूपत कृपा करत नीचन पै कर अनीति प्रतिपाला जबर जोर कलिकाल काल कौ गुन कौ चलै न चाला ।५। मुसलमान सीतापति सुमरे हिन्दू मुख हकताला मुसलमान मौसी कर टेरे हिन्दू टेरैं खाला साची कहे सुनै को बिनती भयो नीच बल वाला अधरम प्रगट भयो भूतल पै धसगो धरम पताला ।६। जगतगुरू विप्रन को निन्दत बेनिक पुत्र घर वाला मुछमुण्डन की दच्छा लै लै फेरे तुलसीमाला ।७।
लक्ष्मीबाई ५०३ मालपुआ हलुआ भोजन दै गुप्त खिलावत लाला अधरम नाम जपत सीतापत डार गोमुखी माला दीसे भक्त बडे ठाकुर के तिलक सरसरे भाला जाचत देख विप्र साधुन को होत क्रोध को जाला ।८। कासीपुरी अजुध्या मथुरा इनको जात कसाला दोम दोम कर जात मदारन दाब काख में लाला पूजत प्रेत गुरैया बाबा छोडे देव बिसाला निजपति मुच्छ तुच्छ कर जारत उपपति हित प्रतिपाला ।६। बिछिया दृगन कोर भर कारज अग आभरन जाला मुलकट कचुक कसत कुचन पै उर धारे बनमाला अधरम............ यही तक कवि ने लिख पाया । ( ५ ) नारायण शास्त्री की प्रेमका छोटी का असली नाम लोग मछरिया बतलाते हैं । उपन्यास में जितने नाम आये हैं सब वास्तविक हैं । मैने केवल मछरिया का नाम बदलकर छोटी कर दिया है । झाँसी में नारायण शास्त्री में तत्रवल को जो रूप जनपरम्परा में मिला है वह बडा संकेतपूर्ण है । कहते हैं कि एक रात नारायण शास्त्री काली का पूजन करके मास और मदिरा का सेवन करना ही चाहते थे कि राजा गंगाधरराव टोह लगाकर आ पहुचे । राजा ने पूछा, 'बोतल में क्या है ?' शास्त्री ने उत्तर दिया, 'दूध ।' 'और कटोरे में क्या है शास्त्री जी ?' 'गुलाब के फूल ।' राजा ने बोतल और कटोरे का निरीक्षण किया तो बोतल में दूध और कटोरे में गुलाब के फूल पाये । जब नव्वे वर्ष के भीतर ही जन- परम्परा ने एक वास्तविकता को यह रूप दे दिया तो अपने बडो के स्वा-
भाविक किन्तु लोकाचार विरुद्ध कृत्यो को, उसने गाथाओ मे जो रूप दे दिये हैं उनको, समझने में बहुत बाधा नही रहनी चाहिये । ( ६ ) गंगाधरराव अत्यन्त क्रोधी थे । उनके अत्याचारो की बहुत सी कहा- निया प्रसिद्ध हैं । उनके प्रति जनता की घृणा रानी लक्ष्मीबाई के नाम के कारण नरम पड गई थी और अब भी नरम है । ( ७ ) झासी मे हरदी कुंकू उत्सव महाराष्ट्रो में बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता था । झासी की साधारण जनता भी उसको मनाया करती थी । अब भी यह सुन्दर उत्सव मनाया जाता है, परन्तु उसमे अब वह ओज नही रहा । जीवन के सघर्षों और वर्तमान उदासीनता में वह घिस गया है । रानी लक्ष्मीबाई इस उत्सव को कितनी उमंग के साथ मनाती थी उसका व्योरेवार वर्णन विष्णुराव गोडशे के 'माझा प्रवास' मे है । ( ८ ) पेशवा के साथ अङ्गरेजो ने सन् १८०२ में जो सन्धि की थी उसको पारसनीस ने अपनी पुस्तक में उद्धृत किया है । ( ९ ) भग्गी दाउजू जाति के सुनार थे । वे झाँसी के गदीगर मुहल्ले में रहते थे । नत्थेखा की लडाई पर उन्होने तीन चार पृष्ठो में एक रायसा लिखा था । वह श्री नारायणदास शृङ्गीऋषि के पास है । उन्ही की कृपा से रायसा मुझको प्राप्त हुआ । मन्जु छन्द में है । प्रत्येक छन्द का चौथा चरण है— 'झासी की जो लटी तकै तिर्हि खाये कालका माई ।' भग्गी ने 'रानी की जो लटी तकै' नही लिखा है; उन्होने 'झासी' शब्द प्रयुक्त किया है और उसकी सार्थकता बहुत द्योतक है । झासी -१८५७ के विप्लव के ज़माने में जोश से उमड पडी थी । किसी जाति के लिये भी नही कहा जा सकता कि उसमें लड़ाई के लिये कम जोश था ।
लक्ष्मीबाई ५०५ यह ऐतिहासिक सत्य है कि उनाव दरवाजे पर कोरियो की तोप थी और तोपखाने का सचालक पूरन कोरी था । उसके पौत्र ने मुझको सारी घटनायें बतलाई और झलकारी के विकट और निर्भीक पराक्रम का हाल सुनाया । जनरल रोज ने अपनी डायरी में झलकारी की घटना का वर्णन नही किया है, परन्तु कोरियो में वह घटना विख्यात है—४ एप्रिल १८५८ की रात को रानी के निकल जाने पर, पाच के बडे सवेरे झलकारी घोडे पर बैठकर रोज के सामने पहुची और उससे कहा, 'रानी को कहा ढूंढते फिरते हो ? मै हूँ रानी, पकडलो मुझको ।' झलकारी बहुत उमर पाकर मरी । मुझको उसके दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त नही हो पाया । उसके मरने का पता तब लगा, जब रानी की बातो का पता लगाते लगाते मै कोरियो के सम्पर्क में आया । झाँसी में ऊँची जाति के कहलाने वाले लोग कोरियो के हाथ का पानी पीते हैं, घर तो उनके इतने स्वच्छ हैं कि जान पडता है कि अभी अभी किसी यज्ञ को समाप्त करके निबटे हो । कोई आश्चर्य नही यदि रानी ने हरदी कूं कूं के उत्सव में झलकारी को अपने अङ्क में भर लिया हो । ( १० ) अंग्रेज इतिहासकारों ने रानी के वाक्य को, जिसका उच्चार उन्होने अंग्रेजों द्वारा झासी अपहरण के समय किया था, यह रूप दिया है— 'मेरा झासी देगा नही ।' इसकी नकल बहुत से भारतीय लेखको ने की है । रानी हिन्दी और मराठी दोनो जानती थी । इतनी कुशाग्र बुद्धि थी कि झासी आकर उन्होने बुन्देलखण्डी भी सीख ली थी । उनके वाक्य का तोड मरोड एलिस ने अपने लेख में किया और भारतीय लेखको ने बिना जाने बूझे उसकी नकल करदी । १८५७ के लगभग अङ्गरेज खासी हिन्दी भाषा को बोल लेते थे, परन्तु हिन्दी भाषा को कुरूप करना उनकी राष्ट्रीय और स्वभावनिहित उपेक्षा का एक उदाहरण है वे आज भी फ्रेन्च, जर्मन और रूसी शब्दो का तोडमरोड करते हैं । यहा तक कि अमेरिका में बोली
५०६ झांसी की रानी और लिखी जाने वाली अंग्रेज़ी तक पर नाक भोह सिकोड लेते हैं । रानी के मु ह से निकले हुये हिन्दी के प्रतिवाद वाक्य को सुरक्षित रखने में एलिस या किसी भी अंग्रेज को रुचि हो ही क्यो सकती थी ? ( ११ ) रानी ने सूरमाओ की एक कुँवर मडली स्थापित की थी । वे स्त्री- पुरुषो की सूक्ष्म जांच करने की बडी क्षमता रखती थी । झांसी की रक्षा के लिये उनको ऐसे लोगो की जरूरत थी जो अपने को होम देने के लिये सदा तैयार रहते हो । जिसको उन्होने सुपात्र समझा उसको 'कुँवर' का सम्बोधन मिल जाता था रानी ने जितनो को यह उपाधि दी, उनमें से किसी ने भी अपने बलिदान में कसर नही लगाई । ( १२ ) रानी ने जो स्त्री सेना बनाई थी वह भारत का एक अचम्भा है । जनरल रोज, जनरल स्टुअर्ट, डाक्टर लो इत्यादि ने जो रानी के मुकाबले मे लडने वाली अंग्रेजी सेना में झासी आये थे दूरबीनो द्वारा इस सेना का नियम संयम, शौर्य पराक्रम, और दुश्मन का होश ठिकाने लगाने वाली दृढता को देखा था । इस सेना मे महाराष्ट्र स्त्रिया बहुत कम थी । बुन्देलखण्डी स्त्रिया ज्यादा और विविध जातियो की । यदि लक्ष्मीबाई स्वराज्य स्थापना के प्रयत्न मे सफल हो जाती तो भारत की नारी उस गिरी हालत में कदापि न होती जिसमें उसका एक अंश आज है । माझा प्रवास का लेखक विष्णुराव गोडशे जब झासी आया तब झासी की स्त्रियो की स्वाधीनता को देखकर विस्मित हो गया—उसको तो गुस्सा भी आया । स्त्रिया शान और हेकडी के साथ सन्ध्या समय मन्दिरो में जाती थी, यह बात विष्णुराव को बहुत खटकी, क्योकि उसने अन्यत्र न देखी थी । पर क्या अन्यत्र स्त्रियो की कोई वैटालियन थी ? कोई रेजीमेंट था ? उनमें से कोई कर्नल या कप्तान थी ? सवेरे परेड में मर्दों को सबक सिखलाने वाली, और घुडसवारी में मर्दों का कान पकडने वाली स्त्रिया, क्या शाम को मन्दिर जाने के समय झेंपती, शरमाती और घूंघट डालकर
लक्ष्मीबाई ५०७ नयिका भेद को प्रोत्साहन देती ? परन्तु 'माझा प्रवास' का लेखक असली बात समझा न था । मेरी दादी परदादी कहा करती थी कि रानी जिस मिट्टी के ढेले को छू देती थी वह सोना हो जाता था, जिस काठ के टुकडे को स्पर्श कर देती थी वह फौलाद बन जाता था । मुझको आश्चर्य होता था । पर बात लगती बहुत अच्छी थी । सोचता था यदि मै उस ज़माने में होता तो डलियो ढेले उनके पास ले जाता और उनसे स्पर्श करवाकर सोना बनवा लेता, फिर दादी परदादी से पैसे मागने की ज़रूरत ही न रहती । और वे काठ के टुकडो को फौलाद बना देती थी । यह उतना अच्छा नही लगता था । और आज ? आह ! उस रानी का स्पर्श तो प्राप्त नही है, पर नाम ने मिट्टी के ढेलो को स्वर्ण बना दिया और काठ के टुकड़ो को वज्र—और जब तक भारत भारत है वह नाम यह काम करता ही रहेगा । यही कारण है कि अङ्गरेज पलटन के बलवाइयो के सामने लक्ष्मीबाई महल के झरोखे पर चिनौती देती हुई अकेली खडी हो गई ! यही कारण है कि सदाशिवराव नेवालकर के झाँसी नरेश बन जाने की घोषणा पर कोई भी सीखी सिखाई सेना हाथ में न होते हुये भी लक्ष्मीबाई कुछ मिट्टी के ढेलो और काठ के टुकडो को लेकर करेरा में भिड गई और सदाशिवराव को परास्त कर दिया । यही कारण है कि लक्ष्मीबाई नत्थेखा के बीस-हज़ार सिपाहियो का मुकाबिला झाँसी के अधकचरे स्त्री पुरुष सिपाहियो को लेकर कर गई । और उसको मार भगाया ।। सागरसिंह डाकू से जनरल बना और खडेराव फाटक की रक्षा में मरकर अनन्त गौरव पागया । ( १३ ) जान रसल ने जो आवेदन पत्र दिल्ली १७१२ में भेजा था उसका अनुवाद पारसनीस की पुस्तक में है । उसका साराश मैने इस उपन्यास में दे दिया है ।
५०८ झाँसी की रानी ( १४ ) सर जान मालकम सन् १८२५ के लगभग मध्यदेश का प्रधान सेनापति और गवर्नर था । उसने एक पुस्तक Memois of Central India लिखा है । अब यह पुस्तक अप्राप्त है ! मुझको कलकत्ते की Imperial Library से उधार मिल गई थी । मालकम ने लिखा है कि वह जमाना - चाहे दूर हो, पर आवेगा अवश्य, जब हमको हिन्दुस्थानियो का देश उन्हे वापिस करना पडेगा । ( १५ ) ग्वालियर से नाटक मंडली लगभग जनवरी सन् १८५८ में आई थी । रानी यदि फौज को विकट तैयारी और पराक्रम देसकती थी तो कलाओ को प्राण देने की भी साध रखती थी । ग्वालियर से आई हुई नाटक मंडली को हरिश्चन्द्र नाटक का अभिनय करने के उपलक्ष में उन्होने चार हजार रुपया पुरस्कार में दिया था । गवैये, बीनकार, पखावजी इत्यादि सब उनका आश्रय पाये हुये थे । सुखलाल चित्रकार जाति का काछी था । उसकी चित्रकला को वे पुरस्कृत करती रहती थी '। मुखपृष्ट पर दिया गया रानी का, और गङ्गाधरराव का चित्र उसका ही बनाया है । ( १६ ) विष्णुराव गोडशे पूना की दिशा से, ग्वालियर होता हुआ आया था । वह भट्टभिक्षुक था । रानी ने जब झासी में यज्ञ किया तब वह मौजूद था और युद्ध के दिनो मे किले मे ही था । उसने उन दिनो का आखो देखा हाल अपने 'माझा प्रवास, में लिखा है, उपन्यास की कुछ घटनाएं 'माझा प्रवास' के आधार पर हैं । उनके सत्यका निर्धार किम्वदन्तियो और जनरल रोज के खरीतो से होता है । पारसनीस ने अपनी पुस्तक में बहुत सामग्री विष्णुराव की पुस्तक से ली है । परन्तु पारसनीस ने विष्णुराव की पुस्तक का कोई हवाला नही दिया है । कम से कम हिन्दी के अनुवाद में मुझको नही मिला ।
लक्ष्मीवाई ५०६ यज्ञ के समय यज्ञ विधान की एक समस्या खडी हो गई। समस्या का जिक्र उपन्यास में है। उसको विष्णुराव ने अपने शास्त्र ज्ञान से सुलझाया था। उसने ज़रा दम्भ से--और शायद वह दम्भ गलत भी न था--अपने पाण्डित्य का वर्णन 'माझा प्रयास' में किया है। ( १७ ) रानी लक्ष्मीबाई का महल १८५८ में पुस्तकालय के साथ जलाया गया था। पुस्तकालय तो बिलकुल खाक हो गया था, परन्तु महल बच गया था। इसमें सन् १८६६ के लगभग फिर आग लगी। मैं उस समय पाच छ वर्ष का था। मेरे सामने जल रहा था और न जाने मैं क्यो वहा खडा खडा रो रहा था। शायद मेरे आसुओ की जिम्मेदारी परदादी की बतलाई हुई कहानियो पर थी; ऐसी रानी की कहानिया जिसके छूने से मिट्टी के ढेले सोना हो जाते थे और काठ के टुकडे फौलाद । बख्शी की हवेली का पता मुझको १६१६ में लगा था, परन्तु उसका इतिहास १६३२ के उपरान्त मालूम हुआ। बख्शी का नाम उसकी जाति में अब तक इतना प्रिय है कि बच्चो के नाम भाऊ रख दिये जाते हैं ! बख्शी की हवेली अच्छी हालत में है और श्री जिनदास कोचर के अधिकार में है। ( १८ ) अभी हाल में श्री सी० ए० किकेड, पैन्शन प्राप्त आई० सी० एस० ने एक पुस्तक अंग्रेजी में लिखी है Lakshmi Bai, Rani of Jhansi. पुस्तक में कुल १०२ सफे हैं, परन्तु लक्ष्मीबाई को कुल १४ सफे दिये हैं, और, नाम है 'झांसी की रानी लक्ष्मीबाई।' इन १४ पृष्ठो में भी अनेक गलतिया हैं। उन्होने जहां जनरल रोज के लिये कहा है कि वह बेहद, शक्ति वाला और अत्यन्त चतुर सेनापति था तहा रानी की प्रशसा में भी कुछ शब्द कहे हैं-He (General Rose) was a man of boundless energy aud of the highest military talent रानी के लिये श्री किकेड ने कहा है--वह शिक्षित और संस्कृतिमयी थी
५१० झाँसी की रानी (She was an educated and polished lady.) श्री किंकेड की कल्पना है कि न तो लक्ष्मीबाई हत्यारी थी और न उन्होने गदर किया । उनका कहना कि वह एक Lost Cause—हारी पाली—के लिये लड़ी अग्रेज़ को भले ही कबूल हो, पर मुझको मान्य नही । रानी स्वराज्य के लिये लड़ी, स्वराज्य के लिये मरी और 'स्वराज्य की नीव का पत्थर बनी ।' उनके देश वाले यही मानते आये हैं और जब तक भारत में नारीत्व और नरत्व रहेगा यही माना जायगा । परिशिष्ठ का यह खण्ड प्रतिकूल इतिहासकारो और श्री किंकेड सरीखे अनुकूल लेखको की आलोचना के लिये नही लिख रहा हू । जिनको वास्तव में भ्रम निवारण करना हो वे इस उपन्यास को पढे । ( १६ ) दहेज़ में दासियो का दिया जाना राजपूताने की विशेषता है । यह जहर मध्यभारत का नही है । बुन्देलखण्ड़ में तो इसका नाम भी नही । ‘माझा प्रवास’ के लेखक ने उज्जैन के एक यज्ञ का जिक्र करते हुये लिखा है कि एक ब्राह्मण को १३ दासिया दी गई थी और वे उस ब्राह्मण के साथ अपना अञ्चल बाँधकर चल दी थी ! झांसी की रानी को भी कई दासिया मिली थी, परन्तु उन्होने इनके साथ सदा सखी-भाव बर्ता । ( २० ) सुन्दर जिस बुर्ज पर काम कर रही थी वह अब भी टूटी फूटी हालत में है । उसके पराक्रम का प्रमाण ओर्छे दरवाजे बाहर उन अग्रेज़ो की कब्रे हैं जिनको कर्नल सुन्दरबाई की तोपो का मुकाबला करना पड़ा था । ( २१ ) जूही की कोई कब्र नही बनी और न काशीबाई का कोई चैत्य । झांसी वालो के हृदय में जो आसीन हो उनको कब्र या चैत्य की क्या ज़रूरत ? सौन्दर्य और शौर्य का सम्मेलन संसार में बहुत नही दिखलाई पड़ता, परन्तु उनमें बहुत था ।
लक्ष्मीबाई ५११ ( २२ ) रानी घोडे की अद्भुत पहिचान रखती थी । एक बार एक सौदागर दो घोडे लाया । दोनो का दाम एक एक हज़ार बतलाया । रानी ने जल्दी जाच कर ली । जाच पडताल करने के वाद एक का दाम उन्होने एक हज़ार रुपये कूता और दूसरे का पचास रुपया । दोनो घोडे एक से थे । देखने वाले दङ्ग रह गये । सौदागर तो अपने घोडो को जानता ही था, परन्तु उसने कुतूहल शान्ति के लिये रानी से प्रश्न किया । 'इस घोडे का दाम एक हज़ार और दूसरे का पचास क्यों, श्रीमन्त ?' उत्तर मिला, 'जिसके दाम पचास रुपये बतलाये हैं उसकी छाती के भीतर एक पुरानी चोट है ।' सौदागर ने स्वीकार किया । ( २३ ) दामोदरराव को रामचन्द्र देशमुख ग्वालियर से लेजाकर कुछ दिनों जंगलो में छिपाये रहा । जब रानी विक्टोरिया की क्षमा-घोषणा होगई तब देशमुख उसको लेकर इन्दौर में प्रकट होगया । दामोदरराव का देहान्त कुछ वर्ष हुये तब हुआ था और रामचन्द्र देशमुख का लगभग १८८५ में । में दामोदरराव से मिला हू और वातचीत भी की है । ( २४ ) रानी लक्ष्मीबाई के भाई की प्रपोत्री श्रीमती शेवडे नागपूर में हैं । वे कर्वे यूनिवर्सिटी की ग्रेजुयेट हैं । उन्होने इस उपन्यास का अनुवाद मराठी में किया है ।
मयूर-प्रकाशन, झाँसी ∷ ∷ श्री वृन्दावनलाल वर्मा-साहित्य के एकमात्र प्रकाशक ∷ ∷ हमारे प्रकाशन झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ६) मुसाहिबजू .... १॥) मृगनयनी ... ५) लगन ... १।) कचनार ... ४॥) अमरबेल ... ५) प्रेम की भेंट ... १।) टूटे कांटे ... ४।) सोना ... ३) अचल मेरा कोई ... ३॥।) सामाजिक नाटक अहिल्याबाई ... २।) राखी की लाज ... १।) ऐतिहासिक नाटक खिलौने की खोज ... १।) झाँसी की रानी ... २) बांस की फांस ... १) हंस-मयूर ... २।) नीलकंठ .... १।) पूर्व की ओर .... २।) सगुन ... ।।।) बीरबल ... १।) पीले हाथ ... ।।।) जहांदारशाह ... ।।।) मंगलसूत्र ... १) फूलों की बोली ... १।) निस्तार ... १) ललितविक्रम ... १॥।) एकांकी— तोषी ... ।।।) काश्मीर का कांटा ... १) कहानी— लो, भाई पचो लो ... ।।।) शरणागत ... १।) कनेर ... १) कलाकार का दंड ... १।) —: अन्य लेखकों की कृतियां :— कथा काव्य इतिहास क़ब्रों की दुनियां में १॥।) चले चलो ।।।) अगस्त ब्यालीस ५) नई कहानियां १॥) सरसी २) महाप्रयाण २॥) नारी जीवन चक्र १॥) विश्व भारती १॥) रजाकार पतन १॥) रेखायें १।) साहित्य और समाज १) प्राणदण्ड ५)
This page is blank and contains no text to transcribe.