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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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५१० झाँसी की रानी (She was an educated and polished lady.) श्री किंकेड की कल्पना है कि न तो लक्ष्मीबाई हत्यारी थी और न उन्होने गदर किया । उनका कहना कि वह एक Lost Cause—हारी पाली—के लिये लड़ी अग्रेज़ को भले ही कबूल हो, पर मुझको मान्य नही । रानी स्वराज्य के लिये लड़ी, स्वराज्य के लिये मरी और 'स्वराज्य की नीव का पत्थर बनी ।' उनके देश वाले यही मानते आये हैं और जब तक भारत में नारीत्व और नरत्व रहेगा यही माना जायगा । परिशिष्ठ का यह खण्ड प्रतिकूल इतिहासकारो और श्री किंकेड सरीखे अनुकूल लेखको की आलोचना के लिये नही लिख रहा हू । जिनको वास्तव में भ्रम निवारण करना हो वे इस उपन्यास को पढे । ( १६ ) दहेज़ में दासियो का दिया जाना राजपूताने की विशेषता है । यह जहर मध्यभारत का नही है । बुन्देलखण्ड़ में तो इसका नाम भी नही । ‘माझा प्रवास’ के लेखक ने उज्जैन के एक यज्ञ का जिक्र करते हुये लिखा है कि एक ब्राह्मण को १३ दासिया दी गई थी और वे उस ब्राह्मण के साथ अपना अञ्चल बाँधकर चल दी थी ! झांसी की रानी को भी कई दासिया मिली थी, परन्तु उन्होने इनके साथ सदा सखी-भाव बर्ता । ( २० ) सुन्दर जिस बुर्ज पर काम कर रही थी वह अब भी टूटी फूटी हालत में है । उसके पराक्रम का प्रमाण ओर्छे दरवाजे बाहर उन अग्रेज़ो की कब्रे हैं जिनको कर्नल सुन्दरबाई की तोपो का मुकाबला करना पड़ा था । ( २१ ) जूही की कोई कब्र नही बनी और न काशीबाई का कोई चैत्य । झांसी वालो के हृदय में जो आसीन हो उनको कब्र या चैत्य की क्या ज़रूरत ? सौन्दर्य और शौर्य का सम्मेलन संसार में बहुत नही दिखलाई पड़ता, परन्तु उनमें बहुत था ।

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