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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ५११ ( २२ ) रानी घोडे की अद्भुत पहिचान रखती थी । एक बार एक सौदागर दो घोडे लाया । दोनो का दाम एक एक हज़ार बतलाया । रानी ने जल्दी जाच कर ली । जाच पडताल करने के वाद एक का दाम उन्होने एक हज़ार रुपये कूता और दूसरे का पचास रुपया । दोनो घोडे एक से थे । देखने वाले दङ्ग रह गये । सौदागर तो अपने घोडो को जानता ही था, परन्तु उसने कुतूहल शान्ति के लिये रानी से प्रश्न किया । 'इस घोडे का दाम एक हज़ार और दूसरे का पचास क्यों, श्रीमन्त ?' उत्तर मिला, 'जिसके दाम पचास रुपये बतलाये हैं उसकी छाती के भीतर एक पुरानी चोट है ।' सौदागर ने स्वीकार किया । ( २३ ) दामोदरराव को रामचन्द्र देशमुख ग्वालियर से लेजाकर कुछ दिनों जंगलो में छिपाये रहा । जब रानी विक्टोरिया की क्षमा-घोषणा होगई तब देशमुख उसको लेकर इन्दौर में प्रकट होगया । दामोदरराव का देहान्त कुछ वर्ष हुये तब हुआ था और रामचन्द्र देशमुख का लगभग १८८५ में । में दामोदरराव से मिला हू और वातचीत भी की है । ( २४ ) रानी लक्ष्मीबाई के भाई की प्रपोत्री श्रीमती शेवडे नागपूर में हैं । वे कर्वे यूनिवर्सिटी की ग्रेजुयेट हैं । उन्होने इस उपन्यास का अनुवाद मराठी में किया है ।

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