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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

लक्ष्मीवाई ५०६ यज्ञ के समय यज्ञ विधान की एक समस्या खडी हो गई। समस्या का जिक्र उपन्यास में है। उसको विष्णुराव ने अपने शास्त्र ज्ञान से सुलझाया था। उसने ज़रा दम्भ से--और शायद वह दम्भ गलत भी न था--अपने पाण्डित्य का वर्णन 'माझा प्रयास' में किया है। ( १७ ) रानी लक्ष्मीबाई का महल १८५८ में पुस्तकालय के साथ जलाया गया था। पुस्तकालय तो बिलकुल खाक हो गया था, परन्तु महल बच गया था। इसमें सन् १८६६ के लगभग फिर आग लगी। मैं उस समय पाच छ वर्ष का था। मेरे सामने जल रहा था और न जाने मैं क्यो वहा खडा खडा रो रहा था। शायद मेरे आसुओ की जिम्मेदारी परदादी की बतलाई हुई कहानियो पर थी; ऐसी रानी की कहानिया जिसके छूने से मिट्टी के ढेले सोना हो जाते थे और काठ के टुकडे फौलाद । बख्शी की हवेली का पता मुझको १६१६ में लगा था, परन्तु उसका इतिहास १६३२ के उपरान्त मालूम हुआ। बख्शी का नाम उसकी जाति में अब तक इतना प्रिय है कि बच्चो के नाम भाऊ रख दिये जाते हैं ! बख्शी की हवेली अच्छी हालत में है और श्री जिनदास कोचर के अधिकार में है। ( १८ ) अभी हाल में श्री सी० ए० किकेड, पैन्शन प्राप्त आई० सी० एस० ने एक पुस्तक अंग्रेजी में लिखी है Lakshmi Bai, Rani of Jhansi. पुस्तक में कुल १०२ सफे हैं, परन्तु लक्ष्मीबाई को कुल १४ सफे दिये हैं, और, नाम है 'झांसी की रानी लक्ष्मीबाई।' इन १४ पृष्ठो में भी अनेक गलतिया हैं। उन्होने जहां जनरल रोज के लिये कहा है कि वह बेहद, शक्ति वाला और अत्यन्त चतुर सेनापति था तहा रानी की प्रशसा में भी कुछ शब्द कहे हैं-He (General Rose) was a man of boundless energy aud of the highest military talent रानी के लिये श्री किकेड ने कहा है--वह शिक्षित और संस्कृतिमयी थी

५१० झाँसी की रानी (She was an educated and polished lady.) श्री किंकेड की कल्पना है कि न तो लक्ष्मीबाई हत्यारी थी और न उन्होने गदर किया । उनका कहना कि वह एक Lost Cause—हारी पाली—के लिये लड़ी अग्रेज़ को भले ही कबूल हो, पर मुझको मान्य नही । रानी स्वराज्य के लिये लड़ी, स्वराज्य के लिये मरी और 'स्वराज्य की नीव का पत्थर बनी ।' उनके देश वाले यही मानते आये हैं और जब तक भारत में नारीत्व और नरत्व रहेगा यही माना जायगा । परिशिष्ठ का यह खण्ड प्रतिकूल इतिहासकारो और श्री किंकेड सरीखे अनुकूल लेखको की आलोचना के लिये नही लिख रहा हू । जिनको वास्तव में भ्रम निवारण करना हो वे इस उपन्यास को पढे । ( १६ ) दहेज़ में दासियो का दिया जाना राजपूताने की विशेषता है । यह जहर मध्यभारत का नही है । बुन्देलखण्ड़ में तो इसका नाम भी नही । ‘माझा प्रवास’ के लेखक ने उज्जैन के एक यज्ञ का जिक्र करते हुये लिखा है कि एक ब्राह्मण को १३ दासिया दी गई थी और वे उस ब्राह्मण के साथ अपना अञ्चल बाँधकर चल दी थी ! झांसी की रानी को भी कई दासिया मिली थी, परन्तु उन्होने इनके साथ सदा सखी-भाव बर्ता । ( २० ) सुन्दर जिस बुर्ज पर काम कर रही थी वह अब भी टूटी फूटी हालत में है । उसके पराक्रम का प्रमाण ओर्छे दरवाजे बाहर उन अग्रेज़ो की कब्रे हैं जिनको कर्नल सुन्दरबाई की तोपो का मुकाबला करना पड़ा था । ( २१ ) जूही की कोई कब्र नही बनी और न काशीबाई का कोई चैत्य । झांसी वालो के हृदय में जो आसीन हो उनको कब्र या चैत्य की क्या ज़रूरत ? सौन्दर्य और शौर्य का सम्मेलन संसार में बहुत नही दिखलाई पड़ता, परन्तु उनमें बहुत था ।

लक्ष्मीबाई ५११ ( २२ ) रानी घोडे की अद्भुत पहिचान रखती थी । एक बार एक सौदागर दो घोडे लाया । दोनो का दाम एक एक हज़ार बतलाया । रानी ने जल्दी जाच कर ली । जाच पडताल करने के वाद एक का दाम उन्होने एक हज़ार रुपये कूता और दूसरे का पचास रुपया । दोनो घोडे एक से थे । देखने वाले दङ्ग रह गये । सौदागर तो अपने घोडो को जानता ही था, परन्तु उसने कुतूहल शान्ति के लिये रानी से प्रश्न किया । 'इस घोडे का दाम एक हज़ार और दूसरे का पचास क्यों, श्रीमन्त ?' उत्तर मिला, 'जिसके दाम पचास रुपये बतलाये हैं उसकी छाती के भीतर एक पुरानी चोट है ।' सौदागर ने स्वीकार किया । ( २३ ) दामोदरराव को रामचन्द्र देशमुख ग्वालियर से लेजाकर कुछ दिनों जंगलो में छिपाये रहा । जब रानी विक्टोरिया की क्षमा-घोषणा होगई तब देशमुख उसको लेकर इन्दौर में प्रकट होगया । दामोदरराव का देहान्त कुछ वर्ष हुये तब हुआ था और रामचन्द्र देशमुख का लगभग १८८५ में । में दामोदरराव से मिला हू और वातचीत भी की है । ( २४ ) रानी लक्ष्मीबाई के भाई की प्रपोत्री श्रीमती शेवडे नागपूर में हैं । वे कर्वे यूनिवर्सिटी की ग्रेजुयेट हैं । उन्होने इस उपन्यास का अनुवाद मराठी में किया है ।

मयूर-प्रकाशन, झाँसी ∷ ∷ श्री वृन्दावनलाल वर्मा-साहित्य के एकमात्र प्रकाशक ∷ ∷ हमारे प्रकाशन झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ६) मुसाहिबजू .... १॥) मृगनयनी ... ५) लगन ... १।) कचनार ... ४॥) अमरबेल ... ५) प्रेम की भेंट ... १।) टूटे कांटे ... ४।) सोना ... ३) अचल मेरा कोई ... ३॥।) सामाजिक नाटक अहिल्याबाई ... २।) राखी की लाज ... १।) ऐतिहासिक नाटक खिलौने की खोज ... १।) झाँसी की रानी ... २) बांस की फांस ... १) हंस-मयूर ... २।) नीलकंठ .... १।) पूर्व की ओर .... २।) सगुन ... ।।।) बीरबल ... १।) पीले हाथ ... ।।।) जहांदारशाह ... ।।।) मंगलसूत्र ... १) फूलों की बोली ... १।) निस्तार ... १) ललितविक्रम ... १॥।) एकांकी— तोषी ... ।।।) काश्मीर का कांटा ... १) कहानी— लो, भाई पचो लो ... ।।।) शरणागत ... १।) कनेर ... १) कलाकार का दंड ... १।) —: अन्य लेखकों की कृतियां :— कथा काव्य इतिहास क़ब्रों की दुनियां में १॥।) चले चलो ।।।) अगस्त ब्यालीस ५) नई कहानियां १॥) सरसी २) महाप्रयाण २॥) नारी जीवन चक्र १॥) विश्व भारती १॥) रजाकार पतन १॥) रेखायें १।) साहित्य और समाज १) प्राणदण्ड ५)

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