झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ झाँसी की रानी गङ्गाधरराव के पास भी ख़बर पहुंची । वह तटस्थ से थे, और कट्टर- पंथियो के नायको का उन्होने मजाक भी उडाया । पर इससे कट्टरपन्थ की धार को जरा और तेजी मिली । घर-घर वाद-विवाद होने लगा । अमुक वर्ग शूद्र है, अमुक सवर्ण इस बात पर खूब ले-दे मची । घरो के बाहर के चबूतरो पर, बैठको में, तम्बोलियो की दूकानो पर, मन्दिरो में, . पाठशालाओ में, दावतो-जेवनारो में, बाजार-बाजार में, चर्चा का यही प्रधान विषय । उस समय झाँसी में दो अच्छे कवि थे । एक हीरालाल व्यास, दूसरे 'पजनेश' । हीरालाल ने अपना उपनाम 'हृदयेश' रक्खा था । हृदयेश वैसे उदार विचारो के थे, उस समय के लिहाज से राष्ट्रवादी । पजनेश शृङ्गार-रस के कवि थे । अन्य जाति की एक सुन्दरी रक्खे हुये थे और नारायण शास्त्री के मित्र थे । दोनो रसिक । इसलिये कट्टर पन्थियो के प्रतिकूल थे । पजनेश ने इस विषय पर कुछ छन्द भी बनाये परन्तु समय की हवा के खिलाफ होने के कारण पजनेश के तर्क-वितर्क वाले थोडे से छन्द बिलकुल पिछड़ गये और हृदयेश का कट्टरपन्थी पक्षपात छन्दो की बाढ में बहने लगा । दुर्गा लावनी वाली एक वेश्या थी । अच्छी गायिका और विलक्षण नर्तकी । उसने बहुमत का साथ दिया । हृदयेश के छन्द गाती और कभी अपनी बनाई हुई लावनियो में उस पक्षपात को चमकाती । नारायण शास्त्री दाँत पीसते और सिरतोड परिश्रम अपने पक्ष की पुष्टि के लिये करते । पजनेश ने उस पक्ष के समर्थन में कविता करना बन्द कर दिया । हृदयेश को गली-कूचे, हाट-बाजार और मन्दिरो में इतना महत्व मिलते उन्हे अच्छा नही लगा । खासतौर पर दुर्गा सरीखी प्रसिद्ध नर्तकी और सुन्दरी द्वारा हृदयेश के बनाये हुये छन्दो का गायन । वह नारायण शास्त्री के घर अब और अधिक आने-जाने लगे और अधिक समय तक बैठने-उठने लगे । नारायण शास्त्री का शास्त्रोक्त समर्थन सीख-सीख कर वाद-विवाद में पूरी मुँहजोरी के साथ उद्धृत करने लगे । एक दिन