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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४२ झाँसी की रानी गङ्गाधरराव के पास भी ख़बर पहुंची । वह तटस्थ से थे, और कट्टर- पंथियो के नायको का उन्होने मजाक भी उडाया । पर इससे कट्टरपन्थ की धार को जरा और तेजी मिली । घर-घर वाद-विवाद होने लगा । अमुक वर्ग शूद्र है, अमुक सवर्ण इस बात पर खूब ले-दे मची । घरो के बाहर के चबूतरो पर, बैठको में, तम्बोलियो की दूकानो पर, मन्दिरो में, . पाठशालाओ में, दावतो-जेवनारो में, बाजार-बाजार में, चर्चा का यही प्रधान विषय । उस समय झाँसी में दो अच्छे कवि थे । एक हीरालाल व्यास, दूसरे 'पजनेश' । हीरालाल ने अपना उपनाम 'हृदयेश' रक्खा था । हृदयेश वैसे उदार विचारो के थे, उस समय के लिहाज से राष्ट्रवादी । पजनेश शृङ्गार-रस के कवि थे । अन्य जाति की एक सुन्दरी रक्खे हुये थे और नारायण शास्त्री के मित्र थे । दोनो रसिक । इसलिये कट्टर पन्थियो के प्रतिकूल थे । पजनेश ने इस विषय पर कुछ छन्द भी बनाये परन्तु समय की हवा के खिलाफ होने के कारण पजनेश के तर्क-वितर्क वाले थोडे से छन्द बिलकुल पिछड़ गये और हृदयेश का कट्टरपन्थी पक्षपात छन्दो की बाढ में बहने लगा । दुर्गा लावनी वाली एक वेश्या थी । अच्छी गायिका और विलक्षण नर्तकी । उसने बहुमत का साथ दिया । हृदयेश के छन्द गाती और कभी अपनी बनाई हुई लावनियो में उस पक्षपात को चमकाती । नारायण शास्त्री दाँत पीसते और सिरतोड परिश्रम अपने पक्ष की पुष्टि के लिये करते । पजनेश ने उस पक्ष के समर्थन में कविता करना बन्द कर दिया । हृदयेश को गली-कूचे, हाट-बाजार और मन्दिरो में इतना महत्व मिलते उन्हे अच्छा नही लगा । खासतौर पर दुर्गा सरीखी प्रसिद्ध नर्तकी और सुन्दरी द्वारा हृदयेश के बनाये हुये छन्दो का गायन । वह नारायण शास्त्री के घर अब और अधिक आने-जाने लगे और अधिक समय तक बैठने-उठने लगे । नारायण शास्त्री का शास्त्रोक्त समर्थन सीख-सीख कर वाद-विवाद में पूरी मुँहजोरी के साथ उद्धृत करने लगे । एक दिन