झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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लक्ष्मीबाई ४६ गङ्गाधरराव ने वह गरम जनेऊ तुरन्त अलग करा दिया । युवक से बोले, 'श्रीमन्त पेशवा भी तो यही दण्ड देते ।' 'नही सरकार', युवक ने निर्भयता के साथ सम्मति दी, 'धर्म अपने अपने विश्वास की बात है । इसमें राज्य को तटस्थ रहना चाहिये ।' 'लोकाचार भी ?' गङ्गाधरराव ने जरा-सा मुस्कराकर प्रश्न किया । 'हा महाराज', युवक ने विनीत और मधुर स्वर में उत्तर दिया, 'लोकाचार समय-समय पर बदलते रहते हैं।' गङ्गाधरराव के क्रोध ने कुछ ठण्डक पाई । उनकी दृष्टि उस युवक के टोप पर जा टिकी । कुछ क्षण ठहरी । कुतूहलवश पूछा, 'यह टोप क्यो लगाते हो ?' युवक ने उत्तर दिया, 'मैं सिपाही हूँ।' राजा को इस उत्तर पर हँसी आई । बोले 'हमारे यहा तात्या दीक्षित
- एक शास्त्रज्ञ ब्राह्मण हैं, सो जानते ही हो । तुम सिपाही ब्राह्मण हो, परन्तु नाम से बुलाने मे कभी-कभी गडबड हो सकती है । इसलिये तुमको तात्या टोपी वाले या सीधा टोपे कहे तो कैसा ?' हँसकर युवक ने जवाब दिया, 'श्रीमन्त सरकार, मुझको इसी छोटे से नाम से लोग पुकारते हैं । 'मुझे भी पसन्द है।' राजा ने कहा । फिर जनेऊ वाले अपराधियो को बनावटी रूखे स्वर में डाटते हुये बोले, 'इस युवक ने तुमको बचा लिया—भाग जाओ ।' वे लोग चले गये । राजा ने तात्या टोपे को नाटकशाला के लिये आमन्त्रित करते हुये कहा, 'टोपे आज रात को हमारी नाटकशाला में रत्नावली नाटक खेला जायगा । आना । बहुत अच्छा अभिनय, गायन- वादन और नृत्य है । पहले कभी देखा ?' 'नही सरकार', टोपे ने उत्तर दिया । 'पढा है?' दूसरा प्रश्न किया गया । 'नही सरकार', टोपे ने फिर उत्तर दिया ।