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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४८ झाँसी की रानी राजा ने अपराधियो से पूछा, 'क्या ब्राह्मण बनना चाहते हो ?' अपराधियो में एक अधिक साहस वाला था । उसने उत्तर दिया, 'नही तो सरकार ।' 'फिर यह अनुचित काम क्यो किया ? 'अनुचित तो नही है सरकार ।' 'क्योरे अनुचित नही है ?' 'सरकार ! ब्राह्मणो के अलावा और अनेक जातियाँ भी तो जनेऊ पहिनती हैं ।' 'अवे बदमाश, उन जातियो की बराबरी करता है ? वह चुप रहा । गंगाधरराव का क्रोध चढ लेने पर उतरता मुश्किल से था । बोले, 'जनेऊ तोडकर फेक दे और फिर कभी आगे न पहिनना ।' उसने हाथ जोडे सिर नीचा कर लिया । राजा ने कडक कर कहा, 'क्या कहता है ? अपने हाथ से तोडता है या तुडवाऊँ ?' उसने उत्तर दिया, 'अपने हाथो तो हम लोग अपने जनेऊ नही तोडेंगे चाहे प्राण भले ही निकल जावे । आप राजा हैं, चाहे जो करे ।' गंगाधरराव की आंखो के लाल डोरे रक्त हो गए । चोबदार को हुक्म दिया, 'एक पतला तार लाओ । ताबा, लोहा किसी का भी । जल्दी लाओ ।' वह दौडकर ले आया । आगी मगवाई गई । तार को जनेऊ का आकार बनाकर गरम किया गया । आज्ञा दी, 'यह गरम जनेऊ इसको पहिनाओ ।' अपराधी ने गर्व से सिर ऊँचा किया । आकाश की ओर एक क्षण के लिये हाथ बाधकर देखा और फिर नतमस्तक हो गया । वह गरम जनेऊ उसके कधे को छुलाया ही गया था कि युवक तात्या ने विनय की, महाराज धर्म की रक्षा करिये । यह ठीक नही है ।'