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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ४७

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पजनेश जिस पक्ष का अभी तक जोरदार समर्थन करते चले आये थे उसको उन्होंने छोड दिया । नारायण शास्त्री लगभग खामोश होगये । नए उपनीतो ने बडाई स्वयं अपने हाथो मे लेली और एकाध जगह वह लडाई जीभ से खिसक कर हाथ और डंडे पर आ बैठी । झंझट का रूप ज़रा भयानक हो गया । मामला गंगाधरराव के पास पहुचा । जाति और धर्म का झगडा था, इसलिये उन्होंने दखल देने की ठानी । नये जनेऊ वाले लोग बुलाये गये । प्रमुख ब्राह्मण भी । उस दिन कुछ वाद विवाद हुआं, पर राजा किसी निष्कर्ष पर नही पहुचे । छोटी जाति के कहे जाने वाले जनेऊ धारियो ने नारायण शास्त्री को पेश करने की मुहलत मागी । एक दिन का समय मिला । उन लोगो ने नारायण शास्त्री को सहज ही राजी कर लिया । उसी दिन बिठूर से तात्या दीक्षित और युवक तात्या झासी आये । दीक्षित ने बिठूर का सब समाचार राजा को सुनाया । राजा ने सब शर्तें मंजूर करली । मगनी की रस्म बिहूर में हो आई थी, परन्तु सीमन्ती इत्यादि विवाह की अन्य रीतिया झासी में किसी मकान में होकर होगी इसका प्रबन्ध राजा ने अपने कर्मचारियो के सुपुर्द कर दिया । इसके लिये युवक तात्या को झासी में दो एक दिन के लिये ठहरना पडा । दूसरे दिन जनेऊ सम्बन्धी झगडे की पेशी होने को थी । युवक तात्या भी इस विलक्षण मुकद्दमें को सुनना चाहता था । दरबार में गया । उसको फौजी अफसर की पोशाक पसन्द थी । खास तौर पर लोहे की फ्रांसीसी टोपी । गंगाधरराव ने उसको आदर के साथ बिठलाया । बाजीराव पेशवा का कर्मचारी और भविष्य की ससुराल से आया हुआ मिहमान । राजा अपने पदाभिमान के आतंक में आगये और शास्त्रियो के थोड़े से ही विवाद के सुनने के बाद वे न्याय-निष्ठुरता पर जम गये ।