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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४६झांसी की रानी

शास्त्री ने अपनी घबराहट को किसी तरह नियन्त्रित करके उस युवती से कहा, 'थोडी देर मे आना तब तुम्हारा काम कर दूंगा। समझी छोटी ?' युवती के खरे रग पर लाली दौड गई। वह 'हाँ' कहकर गजगति से नही, बिल्ली की तरह वहा से भाग गई। शास्त्री और कवि दोनो किसी एक बडे बोझ से मानो दब गये। पजनेश के मुँह से वाक्य फूट पडा, 'यह कौन ?' शास्त्री—'छोटी।' पजनेज—'यह तो उसका नाम है। वह है कौन ?' शास्त्री—'स्त्री।' पजनेश—'यह तो मैं भी देखता हू। कौन स्त्री ?' शास्त्री—'एक काम से आई थी।' पजनेश—खैर मुझको कुछ मतलब नही, परन्तु यदि...... शास्त्री ने बात काट कर पूछा, 'परन्तु यदि क्या ? आप क्या इसके सम्बन्ध में मेरे ऊपर सन्देह करते हैं ?' पजनेश ने एक क्षण सोचकर उत्तर दिया, 'बस्ती के लोग क्या इसी स्त्री की चर्चा करते हुये आप पर लाछन लगा रहे हैं ? यदि ऐसा है तो आपको सावधान हो जाना चाहिये। उस स्त्री की जाति वाले उसका सर्वनाश कर डालेगे और राजा आपका।' शास्त्री ने कहा, 'झूठा आरोप है। मे किसी से नही डरता।' 'आप जानें,' पजनेश बोले, 'मेरा कर्तव्य था सो कह दिया।' पजनेश उठे। शास्त्री ने एक पान और खाने का अनुरोध किया, परन्तु पजनेश बिना पान खाये चले गये। बाहर निकल कर उनकी आंख ने इधर उधर उस युवती को ढूँढा, परन्तु वह न दिखलाई पड़ी। उन्हे आश्चर्य था, 'इस जाति में भी पद्मिनी होना सम्भव है।'

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