भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

लक्ष्मीबाई ४५ शास्त्री—'व्यर्थ है ! बकने दो । मै परवाह नही करता । अपना काम देखो ।' पजनेश—'मेरी समझ मे श्रीमन्त सरकार से फरियाद करनी चाहिये वे जब कठोर दण्ड देगे तब यह बदनामी खत्म होगी ।' शास्त्री—'मै ऐसी सडियल वात को राजा के सामने नही ले जाना चाहता । राजा तो यो भी उन कथा वाचको की दिल्लगी उड़ाया करते हैं ।' पजनेश—'तव मैं कहूगा ।' शास्त्री को प्रस्ताव पसन्द नही आया । बोले, 'यह और भी बुरा होगा । राजा कहेगे कि कुछ रहस्य अवश्य है तब तो स्वय फरियाद न करके मित्र से करवाई ।' फिर विषयातर के लिये कहा, 'आज घर से इतनी जल्दी कैसे निकल पडे ?' पजनेश ने उत्तर दिया, 'कान नही दिया गया तो इसी चर्चा के लिये आपके ••' पजनेश का वाक्य पूरा नही हो पाया था—कि उतरती अवस्था की एक स्त्री डलिया झाडू लिये दरवाजे पर आई । बह बाहर ही रह गई । उसके पीछे उससे सटी हुई एक युवती थी । वह कुछ अच्छे वस्त्र पहिने थी, थोडे से आभूषण भी । साफ सुथरी । युवती उतरती अवस्था वाली स्त्री को एक ओर करके मुस्कराती हुई पौर में आगई । प्रवेश करते समय उसने पजनेश को नही देखा था । परन्तु भीतर धसते ही पजनेश की भाई पड गई । ठिठकी । लौटने के लिये मुडी और खडी रह गई । दूसरी स्त्री से बोली, 'कोसा पौर में तो कोई कूड़ा नही ।' कोंसा ने कहा, 'मैं आती हू । ठहरना ।' पजनेश ने देखा ऊँची जाति की सुँदर स्त्रियो जैसी सुन्दर है । नायिकाभेद की कुछ उपमाये स्मरण हो आई, कमलगात, मृगनयन, कपोत ग्रीवा, कमलनालकटि । नायिका भेद का साहित्य और आगे साथ न दे सका । कवि का मन आकर्षण और ग्लानि की खींचतान में पड़ गया ।