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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४४ झाँसी की रानी

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एक दिन ज़रा सवेरे ही पजनेश नारायण शास्त्री के घर पहुँचे। शास्त्री अपनी पौर में बैठे थे जैसे किसी की बाट देख रहे हो। पजनेश को कई बार आओ आओ कहकर बिठलाया, परन्तु पजनेश ने यदि शास्त्री की आंख की कोर को बारीकी से परखा होता तो उनको मालूम हो जाता कि उनके आने पर शास्त्री का मन प्रसन्न नही हुआ था। पजनेश पौर के चबूतरे पर दरवाजे की ओर पीठ करके बैठ गये। शास्त्री दरवाजे की ओर मुंह किये बैठे थे। शास्त्री ने पान खाने के लिए पानदान बढ़ाया। पजनेश के जी में एक क्षणिक झिझक उठी। उसको दबा लिया और पान लगाकर खा लिया। शास्त्री ने पूछा, 'कोई नया समाचार ?' 'अब तो आपके चरित्र पर ही लांछन लगाया जाने लगा है।' पजनेश उत्तर देकर पछताए। उस प्रसग का प्रवेश और किसी तरह करना चाहते थे। शास्त्री ने आंख चढ़ाकर कहा, 'मैने भी सुन लिया है।' पजनेश ने दम ली। शास्त्री कहते गये, 'मूर्खों के पास जब युक्ति नहीं रहती तब वे गालियों पर आ जाते हैं। मैं क्या गाली गलौज के दबाव में शास्त्र-चर्चा को छोड़ दूँगा ? बदमाशों को मुंहतोड़ जवाब दूँगा । उस पक्ष के जितने शास्त्री हैं, चाहे महाराष्ट्र हो चाहे एतद्देशीय, सब इन बनियों महाजनों और सरदारों के किसी न किसी प्रकार आश्रित हैं। और ये आश्रयदाता हैं—पुरानी लीकों के पुजारी। मक्षिकास्थाने मक्षिका वाले। ये लोग शास्त्र का पारायण नहीं करते-अथवा करते हैं तो सच बात न कहकर यजमानों को संतुष्ट करने के लिये केवल उनकी मुंह-देखी कहते हैं। तन्त्रशास्त्र वालों का मूल, ज्ञान-विज्ञान और सत्य में है; वे अवश्य पुराणियो और कथा-वाचकों के साथ असत्य की सोभ नहीं करते।' पजनेश—'परन्तु अपवाद का दमन जरूरी है।'