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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ५१

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जनेऊ विरोधी पक्ष वाले किले से परम प्रसन्न लौटे। अपने पक्ष की विजय का समाचार बहुत गम्भीरता के साथ सुनाना शुरू करते थे और फिर पर पक्ष की मिट्टी पलीत होने की बात खिलखिलाकर हँसते हुये समाप्त करते थे। शहर भर मे घूम मच गई, 'तामे और लोहे के जनेऊ आगी मे लाल कर-करके राजा ने पहिनाये। नही तो इन्होने आज जनेऊ पहिने थे, कल वेदो की ऋचाये आल्हा की तरह गली-गली बकते फिरते।' कोई कहते थे, 'अजी बडी कुशल समझो, बिठूर वाले मिहमान दरवार में न होते तो राजा सिर काटकर फेक देने का हुकुम दे चुके थे।' नारायण शास्त्री यह सब वाङ्मय चुपचाप सुनते हुये घर आये। उदास थे। किवाड लटका कर पौर के चबूतरे की चटाई पर लेट गये। देर तक लेटे रहे। सन्ध्या हो गई। अन्धेरा छा गया। वह उठे। दियाबत्ती की। कुछ खा-पीकर फिर पौर में आ बैठे। किसी ने धीरे से साकल खटकाई। नारायण शास्त्री ने किवाड खोले। छोटी थी। भीतर आ गई। शास्त्री ने किवाड बन्द करके साँकल चढा ली। छोटी चबूतरे पर बैठ गई। शास्त्री की उदासी जा चुकी थी। छोटी के नेत्रो में कटाक्ष सरल था, परन्तु सरल चितवन मे ही मद बहुत। छोटी ने अपने एक घुटने पर ठोढी टेक कर नजर उठाई। बरौनियां भोहो के ऊपर जाने को हुईं। बोली, मैं तो बडी हैरान हूँ। लोग बहुत तग करते हैं। छेडते हैं। आपका नाम ले-लेकर आवाजे कसते हैं।' शास्त्री ने भोह सिकोड कर कहा, 'उंह बकने दो छोटी। ज़रा भी परवाह मत करो।' 'मुझको आप ही की फिकर रहती है,' छोटी बोली, 'अपने लिये कोई खटका नही। मेरी जात वाले लोग मुझको जात बाहर करना चाहते हैं। सुग-सुग चल रही है।' 'फिर क्या करोगी?' 'क्या करूंगी—आप ही बतलाइये।'

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