भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 63

५२ झांसी की रानी 'देखा जायगा ।' 'कब ?' 'जब बात सामने आवेगी तब ।' 'और ये लोग जो मुझसे छेड़-छाड़ करते हैं, उनका क्या करूँ ?' 'उनसे आँख बरकाओ । कान मूँदकर अपना रास्ता लिया करो ।' 'ऐसी छेड़-छाड़ को तो मे अनसुनी कर सकती हूँ, करती ही रहती हूँ, परन्तु वे प्रेम की बाते करते हैं ।' 'अच्छा !' 'हाँ ! कोई अप्सरा कहता है । कोई कविता न्योछावर करने की बात कहता है । कोई सौगन्ध खाता है कि तेरे लिये सब कुछ छोडने को तैयार हूँ ।' 'तुम क्या जवाब देती हो ?' 'किसी को कुछ, किसी को कुछ । कुछ से मैने पूछा, जनेऊ भी उतार देने को तैयार हो ?' 'उन लोगो ने इस सवाल के पल्टे में क्या कहा ?' 'उन्होने कहा उतार देगे ।' छोटी मुसकराई । शास्त्री को गुस्सा आया । थोड़ी देर सोचते रहे । कभी सिर खुजलाते और कभी छोटी को देखते थे । बोले, 'छोटी, यदि बात ऊपर ही आ जावे तो मे मारे जाने तक के लिये तैयार हू । तुम पक्की हो ?' उसने दृढ़ता के साथ उत्तर दिया, 'क्या आपने कभी कोई कचाहट पाई ?' शास्त्री ने नीची गर्दन करके कहा, 'वैसे ही पूछा था । एक काम करना होगा ।' 'क्या ?' निश्चिन्तता के साथ छोटी ने प्रश्न किया । शास्त्री ने प्रश्न के रूप में उत्तर दिया, 'क्या इन लोगो के जनेऊ उतरवा सकोगी ?'