भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ५३ छोटी सहज वृत्ति से बोली, 'जनेऊ उतरवाने के बदले में कुछ देना न पड़ेगा ? क्या बड़े बड़े लोग यों ही जनेऊ उतार कर दे देगे ?' 'कौन कौग लोग हैं ? जाति और नाम तो बतलाओ ।' शास्त्री ने कहा । छोटी ने ब्योरेवार बतलाया । लम्बी सूची थी । बतलाने में समय लगा । शास्त्री को फिर क्रोध आया । थोड़ी देर जलते-भुनते रहे । उसी समय ऐसा जान पड़ा जैसे किसीने बाहर से साँकल चढ़ा दी हो । छोटी चौंकी । उसने शास्त्री को इशारा किया । शास्त्री धीरे से किवाडो के पास गए । आहट ली । बाहर कुछ खुस-फुसाहट और पैरो का शब्द सुनाई पड़ा । छोटी को सकेत किया, वह आगन में चली गई । शास्त्री ने भीतर की साँकल खोलकर किवाड खोलना चाहा । न खुला बाहर से साकल चढी हुई थी । उन्होने भीतर की साकल फिर चढाली । आँगन में छोटी के पास गये । कहा, 'ये लोग किसी पाजीपन पर तुले हुए हैं ।' छोटी जरा आतुरता के साथ बोली, 'मैने अभी-अभी पूछा था कि ऐसा समय आने पर क्या करूँ । समय आ गया । अब बतलाइये ।' शास्त्री ऊपर से दृढ और भीतर से घबराये हुये थे । चुप रहे । छोटी शान्ति के साथ बोली, 'आप चिन्ता छोडे । किसी तरह अपने को बचावे । मुझको चाहे मार कर घर के कुयें में डालदे । कहदे कि छोटी यहा कभी आई ही नही ।' शास्त्री ने दृढतापूर्वक कहा, 'क्या कहती है छोटी ? मेरे भीतर अभी कुछ बाकी है, जो मुझको मरने के समय भी धीरज दे सकता है । अब सब उघर गया । राजा के सामने जाना पडेगा । मै चाहता हूँ कि तुम्हारा बाल बाका न हो । कह देना कि शास्त्री ने जबरदस्ती की । मै वैसे भी मारा जाऊँगा । तुम इस तरह बच जाओगी ।' 'कभी नही', छोटी गर्व के साथ बोली, 'अगर,हमारी जात मे कोई गुण है तो एक-हम लोग बेईमानी कभी नही कर सकते ।'