झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ५३ छोटी सहज वृत्ति से बोली, 'जनेऊ उतरवाने के बदले में कुछ देना न पड़ेगा ? क्या बड़े बड़े लोग यों ही जनेऊ उतार कर दे देगे ?' 'कौन कौग लोग हैं ? जाति और नाम तो बतलाओ ।' शास्त्री ने कहा । छोटी ने ब्योरेवार बतलाया । लम्बी सूची थी । बतलाने में समय लगा । शास्त्री को फिर क्रोध आया । थोड़ी देर जलते-भुनते रहे । उसी समय ऐसा जान पड़ा जैसे किसीने बाहर से साँकल चढ़ा दी हो । छोटी चौंकी । उसने शास्त्री को इशारा किया । शास्त्री धीरे से किवाडो के पास गए । आहट ली । बाहर कुछ खुस-फुसाहट और पैरो का शब्द सुनाई पड़ा । छोटी को सकेत किया, वह आगन में चली गई । शास्त्री ने भीतर की साँकल खोलकर किवाड खोलना चाहा । न खुला बाहर से साकल चढी हुई थी । उन्होने भीतर की साकल फिर चढाली । आँगन में छोटी के पास गये । कहा, 'ये लोग किसी पाजीपन पर तुले हुए हैं ।' छोटी जरा आतुरता के साथ बोली, 'मैने अभी-अभी पूछा था कि ऐसा समय आने पर क्या करूँ । समय आ गया । अब बतलाइये ।' शास्त्री ऊपर से दृढ और भीतर से घबराये हुये थे । चुप रहे । छोटी शान्ति के साथ बोली, 'आप चिन्ता छोडे । किसी तरह अपने को बचावे । मुझको चाहे मार कर घर के कुयें में डालदे । कहदे कि छोटी यहा कभी आई ही नही ।' शास्त्री ने दृढतापूर्वक कहा, 'क्या कहती है छोटी ? मेरे भीतर अभी कुछ बाकी है, जो मुझको मरने के समय भी धीरज दे सकता है । अब सब उघर गया । राजा के सामने जाना पडेगा । मै चाहता हूँ कि तुम्हारा बाल बाका न हो । कह देना कि शास्त्री ने जबरदस्ती की । मै वैसे भी मारा जाऊँगा । तुम इस तरह बच जाओगी ।' 'कभी नही', छोटी गर्व के साथ बोली, 'अगर,हमारी जात मे कोई गुण है तो एक-हम लोग बेईमानी कभी नही कर सकते ।'