झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७ झांसी की रानी शास्त्री सोच विचार में पड गए । कुछ देर बाद उन्होने एक अनुरोध किया, 'कुछ न कुछ झूठ बनाना पडेगा ।' छोटी बोली, 'सिवाय उस झूठ के और जो कहिये कह दूंगी ।' शास्त्री ने कहा, 'तुम कुछ ब्राह्मणो, बनियो इत्यादि के नाम लेकर कह सकती हो कि इन-लोगो ने अपने जनेऊ उतार कर तुम्हारे हवाले किये हैं ।' छोटी ने उत्तर दिया 'जिन जिन लोगो ने मेरा धर्म मांगा, उन्ही- उन्ही लोगो का नाम लूंगी । औरो के नही । पर जनेऊ कहा हैं ?' शास्त्री ने समाधान किया, 'जनेऊ मैं देता हूँ । नये हैं, उनको मैला कर लेना । कुछ उतारे हुये भी है, उनको नयो में मिला लेना ।' छोटी बोली, 'जल्दी करिये । अभी तो मैं निकल जाऊँगी ।' शास्त्री ने पूछा, 'कैसे ?' छोटी ने कहा, 'आप अपना काम देखिये । मैं निकल जाऊँगी ।' शास्त्री ने बहुतसे नये-पुराने जनेऊ छोटी को दे दिये । छोटीने प्रस्ताव किया, आप पौर का दिया भीतर रख दीजिये । किवाड़ खुलवाने का उपाय कीजिये । तब तक मैं खपरैल पर से कूद कर घर जाती हू । देर लगी तो ये लोग मेरी जातवालो को दरवाजे पर इकट्ठा कर देंगे, और फिर मैं बहुत मारी-पीटी जाऊँगी । अभी तो मुझको कोई न छुयेगा ।' शास्त्री ने मान लिया । उन्होने किवाड खोलने की कोशिश की, परन्तु न खुले । हल्ला करना ठीक न समझा । छोटी खपरैल से कूदकर निकल गई । परन्तु उसके मार्ग में रुकावट डाली गई । फिर भी यह अपने घर पहुच गई, यद्यपि घिरी हुई थी ।